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संपादकीयः आतंकी बौखलाहट

सुरक्षा बलों के तलाशी अभियान के बाद के अनुभव बताते हैं कि घाटी में आतंकी घटनाओं पर लगाम कसी है। फिर राज्य में राज्यपाल शासन लगने के बाद आतंकी संगठनों के खिलाफ सख्ती की रणनीति तैयार हुई, जिससे माना जा रहा है कि अब दहशतगर्दों की कमर टूट जाएगी।

Author July 23, 2018 3:20 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

सुरक्षा बलों के तलाशी अभियान के बाद के अनुभव बताते हैं कि घाटी में आतंकी घटनाओं पर लगाम कसी है। फिर राज्य में राज्यपाल शासन लगने के बाद आतंकी संगठनों के खिलाफ सख्ती की रणनीति तैयार हुई, जिससे माना जा रहा है कि अब दहशतगर्दों की कमर टूट जाएगी। इसके कुछ सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं। पत्थरबाजी और सुरक्षा बलों पर हमले कम हुए हैं। शायद इसी का नतीजा है कि आतंकी संगठनों में अब हताशा और बौखलाहट दिखने लगी है। इसका ताजा उदाहरण उनका दक्षिण कश्मीर में पुलिस के एक प्रशिक्षु सिपाही को अगवा कर मार डालना है। पिछले बीस दिनों में यह दूसरी घटना है, जब दहशतगर्दों ने पुलिस के किसी सिपाही का अपहरण कर उसे मार डाला।

रमजान के दौरान सेना के एक सिपाही को भी इसी तरह मार डाला था। अभी तक वे सुरक्षा बलों पर छिप कर हमले किया करते थे, अब उन्होंने रणनीति बदली है और सिपाहियों को अगवा कर मारने लगे हैं। ताजा घटना में आतंकियों ने छुट्टी मनाने आए पुलिस के सिपाही को उसके परिजनों के सामने घर से उठाया और अगले दिन उसका शव बरामद हुआ। हालांकि इस घटना के बाद पुलिस और सेना तुरंत सक्रिय हो गई और तलाशी अभियान में तीन आतंकियों को मार गिराया। दावा किया जा रहा है कि मारे गए आतंकी ही सिपाही के हत्यारे थे। ऐसी घटनाएं सुरक्षा बलों के लिए नई चुनौती हैं।

दहशतगर्द नहीं चाहते कि घाटी का कोई नौजवान सेना या पुलिस सेवा में भर्ती हो। करीब पंद्रह दिन पहले हिजबुल मुजाहिदीन ने त्राल में पोस्टर लगा कर फरमान सुनाया था कि पुलिस में भर्ती हुए सभी कश्मीरी नौजवान नौकरी छोड़ दें। यह आतंकियों का घाटी के युवाओं को मुख्यधारा में लौटने से रोकने का नया हथकंडा है। पहले ही वे भय दिखा कर, उनमें अतीत की घटनाओं की कहानियां सुना कर या फिर जिहाद के लिए उकसा कर उन्हें गुमराह करने की कोशिश करते रहे हैं। उन्हें पता है कि अगर घाटी के युवा किसी भी तरह रोजगार से जुड़ गए, तो दहशतगर्दों की रणनीति कमजोर पड़ती जाएगी। पिछले अनुभवों से स्पष्ट है कि जब भी स्थानीय लोगों ने सहयोग देना बंद किया और वे रोजी-रोजगार की तरफ अधिक ध्यान देने लगे, आतंकियों को पनाह देना बंद किया, तब दहशतगर्दी पर अंकुश लगा। इसलिए सरकार की कोशिश रहती है कि घाटी के गुमराह नौजवान मुख्यधारा में लौटें और रोजगार से जुड़ें। आतंकवादी इसी कोशिश को विफल करना चाहते हैं।

अभी तक आतंकी संगठन स्थानीय युवाओं को सुरक्षा बलों की ज्यादतियों और सरकार की उदासीनता का हवाला देकर भड़काने में कामयाब होते रहे हैं। जब वे खुद स्थानीय लोगों पर ज्यादतियां करने लगे हैं, तो जाहिर है यह उनकी बौखलाहट के ही संकेत हैं। दक्षिण कश्मीर को आतंकवादियों का गढ़ माना जाता है। वह उनकी मुख्य पनाहगाह है। अब वे वहां पोस्टर चिपका कर फरमान जारी कर रहे हैं कि युवा सरकारी नौकरियां छोड़ दें, तो यह शायद ही किसी कश्मीरी को रास आएगी। कश्मीर में पहले ही रोजगार के अवसर कम हैं, उसमें अगर किसी युवा को सरकारी नौकरी मिलती भी है, तो वह उसे क्यों छोड़ना चाहेगा। फिर जिन परिवारों के बच्चे दहशतगर्दों की गोलियों के शिकार हो रहे हैं, वे भला क्यों उनका समर्थन और सहयोग करना चाहेंगे, क्यों उन्हें पनाह देंगे। इस तरह जब स्थानीय लोगों का समर्थन मिलना बंद होगा, आतंकियों की कमर टूटती जाएगी।

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