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संपादकीयः अपराध का दायरा

पिछले कुछ सालों के दौरान बलात्कार की कुछ घटनाओं के बाद समूचे देश में आक्रोश फैला।

Author September 20, 2018 3:12 AM
आखिर वह कौन-सी स्थिति पैदा हो रही है, जिसमें आज कम उम्र के किशोर भी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने से नहीं हिचक रहे हैं?

देहरादून के एक आवासीय स्कूल में एक छात्रा से सामूहिक बलात्कार के मामले ने एक बार फिर यही साफ किया है कि अपराधों की रोकथाम को लेकर किए जा रहे तमाम सरकारी दावे बुरी तरह नाकाम हैं। इस तरह की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी ज्यादा चिंता इसलिए भी पैदा करती है कि अगर यह एक प्रवृत्ति के रूप में फैलती है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले वक्त में महिलाओं को किस तरह के त्रासद दिनों का सामना करना पड़ेगा और आखिरकार समाज की कैसी तस्वीर बनेगी! पीड़ित बच्ची अभी दसवीं की पढ़ाई कर रही है और उसी स्कूल के चार छात्रों ने दोस्त होने के उसके भरोसे का कत्ल करके उससे बलात्कार किया। यानी जिन स्कूलों से बच्चों के बेहतर मनुष्य बनने की शिक्षा हासिल कर बाहर निकलने की उम्मीद की जाती है, वहां आज कुछ बच्चे अपराध के भी पाठ तैयार कर रहे हैं। ज्यादा शर्मनाक पहलू यह है कि अपराध को अंजाम देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कराने में स्कूल के प्रधानाध्यापक, शिक्षकों और प्रबंधन को मदद करनी चाहिए थी, उल्टे वे आरोपियों के मददगार के रूप में खड़े हो गए। सबने मिल कर पीड़ित बच्ची की ही गलती ठहराई, उसका गर्भपात कराने की कोशिश की गई और धमकी दी गई। किसी तरह मामला स्कूल की चारदीवारी से बाहर आया, तब जाकर पुलिस ने कार्रवाई की।

यह समूची घटना एक तरह से बलात्कार के समाजशास्त्र की परतों को खोल कर रख देती है। आखिर वह कौन-सी स्थिति पैदा हो रही है, जिसमें आज कम उम्र के किशोर भी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने से नहीं हिचक रहे हैं? समाज में चारों तरफ फैले पुरुष वर्चस्व के दुराग्रहों के चलते महिलाओं को पहले ही दोयम दर्जे की जिंदगी गुजारनी पड़ती है और अपराध की पीड़ित होने के बावजूद कई बार उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। समाज में अक्सर बलात्कार या यौन हिंसा की घटनाओं के लिए महिलाओं की जीवनशैली या पहनावे पर अंगुली उठाई जाती है। लेकिन कम से कम स्कूल जैसे संस्थानों से उम्मीद की जाती है कि वहां महिलाओं के खिलाफ अपराधों को बढ़ावा देने वाले दुराग्रहों से बच्चों को मुक्त किया जाएगा और उन्हें एक बेहतर इंसान और सभ्य नागरिक बनाया जाएगा। इस घटना की विडंबना यह है कि स्कूल में प्रबंधन और शिक्षकों ने बलात्कार के आरोपियों को ठीक उसी तरह बचाने की कोशिश की, जैसे आरोप अक्सर महिलाओं के खिलाफ सामंती रुख रखने वाली खाप पंचायतों पर लगाए जाते हैं।

पिछले कुछ सालों के दौरान बलात्कार की कुछ घटनाओं के बाद समूचे देश में आक्रोश फैला। इसका असर इस रूप में भी सामने आया कि सरकार ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रोकथाम के लिए पहले के कानूनों को ज्यादा सख्त बनाया। समाज में इस मसले पर जागरूकता बढ़ने के दावे किए गए। लेकिन वास्तव में आज भी ऐसा कोई बदलाव देखने में नहीं आ रहा है कि पहले के मुकाबले महिलाओं का जीवन सहज होने का दावा किया जा सके। बच्चियों तक के खिलाफ यौन हिंसा या बलात्कार के मामले एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आ रहे हैं। खासतौर पर यह पहलू परेशान करने वाला है कि पिछले कुछ सालों में इस तरह के अपराधों में वयस्कों के अलावा कम उम्र के किशोर भी शामिल पाए जा रहे हैं। जाहिर है, यह कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर व्यापक लापरवाही के आलम में अपराधियों के बेखौफ होने के अलावा समाज के स्तर पर भी एक बड़ी नाकामी है, जो कम उम्र के बच्चों तक को अपराधों में शामिल होने से रोक पाने में नाकाम साबित हो रहा है।

 

 

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