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संपादकीयः महंगाई का र्इंधन

पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ते-बढ़ते रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। इसका अर्थव्यवस्था और जन-जीवन पर असर पड़ना तय है। चूंकि पेट्रोलियम पदार्थ जीएसटी के दायरे में नहीं हैं, और विभिन्न राज्यों में पेट्रोल-डीजल पर करों का अनुपात भिन्न-भिन्न है, इसलिए कीमतों में राज्यवार थोड़ा फर्क है।

Author Published on: May 22, 2018 4:20 AM
पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ते-बढ़ते रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं।

पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ते-बढ़ते रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। इसका अर्थव्यवस्था और जन-जीवन पर असर पड़ना तय है। चूंकि पेट्रोलियम पदार्थ जीएसटी के दायरे में नहीं हैं, और विभिन्न राज्यों में पेट्रोल-डीजल पर करों का अनुपात भिन्न-भिन्न है, इसलिए कीमतों में राज्यवार थोड़ा फर्क है। मसलन, दिल्ली में पेट्रोल का दाम रविवार को छिहत्तर रुपए से भी थोड़ा ऊपर पहुंच गया, तो मुंबई में यह चौरासी रुपए प्रति लीटर को पार कर गया। डीजल की कीमत भी रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई। रविवार को दिल्ली में इसका दाम करीब अड़सठ रुपए तक चला गया। और भी चुभने वाला पहलू यह है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में नरमी आने के फिलहाल दूर-दूर तक कोई आसार नहीं दिख रहे। इससे पहले, पेट्रोल-डीजल की कीमतें इतनी ऊंचाई पर सितंबर 2013 में थीं। तब यह दलील बार-बार दोहराई जाती थी कि यह बाजार का उतार-चढ़ाव है, फिर इसमें ज्यादा हाथ अंतरराष्ट्रीय बाजार का है, ऐसे में भला सरकार क्या कर सकती है! यानी पेट्रोल-डीजल की कीमतें चुभ रही हैं तो क्या हुआ, लोगों को उन्हें परिस्थिति की मजबूरी समझ कर चुपचाप सह लेना चाहिए। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ, तो यह नहीं कहा गया कि अब परिस्थिति बदल गई है, और इसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलना चाहिए। उलटे पेट्रोल-डीजल पर एक बार नहीं, कई बार उत्पाद शुल्क बढ़ा दिए गए।

नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के दरम्यान जब कच्चे तेल के दाम घट रहे थे, सरकार ने नौ बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया। कच्चा तेल महंगा होने पर, सिर्फ एक बार, अक्तूबर 2017 में उत्पाद शुल्क थोड़ा-सा घटाया गया था। अब एक बार फिर राहत देने की मांग उठ रही है, जो विचारणीय है। जब भी इस तरह की मांग उठती है तो उसकी काट में सरकार की तरफ से अकसर यह दलील पेश की जाती है कि वह इसमें दखलंदाजी नहीं कर सकती, फैसला तो तेल कंपनियों को करना है। लेकिन गौरतलब है कि कर्नाटक चुनाव के दौरान चौबीस अप्रैल के बाद दाम नहीं बढ़ाए गए। बारह मई को मतदान हुआ और चौदह मई से कीमतें फिर बढ़नी शुरू हो गर्इं। इससे जाहिर है कि सरकार की तरफ से कोई दखल न दिए जाने की दलील में कोई दम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत चढ़ जाना, पेट्रोल-डीजल के महंगे होने का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू है पेट्रोल-डीजल पर करों का भारी बोझ, और यह बोझ तेल कंपनियों ने नहीं, सरकारों ने डाल रखा है। पेट्रोल के बिक्री-मूल्य में करों का हिस्सा सैंतालीस फीसद है, तो डीजल के बिक्री-मूल्य में अड़तीस फीसद। शायद ही किसी और देश में पेट्रोलियम पदार्थों पर करों का ऐसा बोझ हो। यह बोझ घटाया जाना चाहिए, और इसके लिए यह उपयुक्त अवसर है। फिर, यह केवल उपभोक्ताओं को सीधे राहत देने का मामला नहीं है।

पेट्रोल-डीजल महंगा होने से परिवहन और ढुलाई का खर्च बढ़ता है, और इसके फलस्वरूप जहां कृषि लागत तथा औद्योगिक लागत बढ़ती है, वहीं बहुत सारी चीजों की मूल्यवृद्धि का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसलिए भी पेट्रोलियम पदार्थों पर करों का बोझ कम किया जाना चाहिए। जब सरकार ने कच्चे तेल की कीमत में गिरावट के दौरान उत्पाद शुल्क बढ़ा कर खूब राजस्व बटोरा, तो अब कीमत चढ़ने के दौरान वह करों में कमी करने से क्यों हिचकिचा रही है? और भी अच्छा होगा कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। इससे करों की एक अधिकतम सीमा अपने आप तय हो जाएगी। चूंकि अब अधिकतर राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकारें हैं, इसलिए राज्यों को राजी करना मुश्किल नहीं होना चाहिए।

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