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महंगाई का ईंधन

पेट्रोल और डीजल पर उप कर लगाना आमजन की जेब से पैसा निकालने की दिशा में उठा कदम है। इस बार बजट में सड़क और ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं पर खासा जोर है और इसके लिए सरकार को अगले पांच साल में सौ लाख करोड़ रुपए चाहिए।

Author July 8, 2019 1:07 AM
पेट्रोल-डीजल पर सेस में बढ़ोतरी। फोटो: फाइनेंनशियल एक्सप्रेस

इस बार बजट से आम लोगों को उम्मीद तो यह थी कि सरकार मध्यम वर्ग और गरीब तबके का खयाल रखेगी और ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जिससे लोगों पर महंगाई का बोझ पड़े। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उलटे लोगों को बजट ने निराश ही किया। किसी तरह की राहत देना तो दूर, सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर जिस तरह से उप कर लगाया, वह हैरत में डालने वाली बात है। सरकार जब-जब पेट्रोल और डीजल महंगा करती है तो इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने का तर्क ही दिया जाता है। लेकिन अभी तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम काफी नीचे हैं। ऐसे में यह एक तरह से सरकार का जनविरोधी कदम कहा जाएगा। गरीब के लिए तो महंगाई से बड़ी कोई मार नहीं होती। ऐसे में पेट्रोल और डीजल महंगा होने का मतलब है हर चीज महंगी होना। दूध, फल-सब्जी से लेकर रोजमर्रा के काम में आने वाली सारी चीजों के दाम बढ़ जाएंगे। सार्वजनिक परिवहन सेवाएं महंगी हो जाती हैं। ऑटो, टेंपो तक का भाड़ा बढ़ जाता है। ढुलाई महंगी होने का असर साफ दिखने लगता है। हालांकि वित्त मंत्री ने यह भरोसा दिया है कि पेट्रोल और डीजल महंगा होने का लोगों पर कोई असर नहीं पड़ने दिया जाएगा और महंगाई काबू में रहेगी। लेकिन व्यवहार में ऐसा संभव होता नहीं है। हकीकत तो यह है कि लोग हार कर महंगाई की मार झेलने को मजबूर होते हैं।

पेट्रोल और डीजल पर उप कर लगाना आमजन की जेब से पैसा निकालने की दिशा में उठा कदम है। इस बार बजट में सड़क और ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं पर खासा जोर है और इसके लिए सरकार को अगले पांच साल में सौ लाख करोड़ रुपए चाहिए। इसके लिए पैसे जुटाने का एक उपाय पेट्रोल और डीजल पर उप कर लगाना भी है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री ने तो कहा भी है कि देश में सड़क, बिजली, पानी, रेलवे, गरीबों को एलपीजी मुहैया कराने, गरीबी दूर करने से जुड़े कार्यक्रम शुरू करने और ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं को पूरा करने के लिए भारी रकम की जरूरत है और कर के रूप में मिलने वाले इस पैसे का उपयोग इन्हीं कामों में होगा। समस्या यह है कि कर संग्रह, खासतौर से जीएसटी संग्रह के मामले में सरकार निर्धारित लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाई है। भारत में आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा कर नहीं दे रहा है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल पर कर लगाना एक तरह से जनता पर सीधा कर थोपना है।

सरकार इस बात को भलीभांति समझती है कि आमजन खाना-पीना बंद नहीं करेगा, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग भी करेगा ही। भारत में वाहनों का उपयोग करने वालों की तादाद करोड़ों में है। ऐसे में पेट्रोल खरीदना तो कोई बंद करेगा नहीं। इसलिए जनता की जेब से पैसे खींचने का सबसे बढ़िया रास्ता पेट्रोल और डीजल महंगा करना है। पिछले साल जब पेट्रोल जब अस्सी रुपए के पार चला गया था तब नीति आयोग ने एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण सुझाव दिया था। आयोग का कहना था कि अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपना खजाना भरने का लालच छोड़ दें तो पेट्रोल-डीजल के दाम नीचे लाए जा सकते हैं। पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क जैसे कर थोपने का जो अधिकार राज्यों और केंद्र के पास है, उसमें सरकारों को उदारता दिखानी चाहिए। जाहिर है, सरकारें अपनी कमाई के लिए जनता पर बोझ डाल रही हैं।

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