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बीमार परिदृश्य

तमिलनाडु में विल्लुपुरम के योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा कॉलेज की भारी फीस वसूली और सुविधाओं की नितांत कमी से तंग आकर तीन छात्राओं ने पास के एक कुएं में छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली।

Author नई दिल्ली | January 26, 2016 1:50 AM
तीनों छात्राओं ने कूएं में छलांग लगाकर खुदकुशी कर ली। (तस्वीर में तीनों छात्राओं के बैग) (Express Photo by Arun Janardhanan)

हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या से उपजे चौतरफा रोष का उबाल अभी शांत भी नहीं हुआ है कि तमिलनाडु के एक मेडिकल कॉलेज की तीन छात्राओं की खुदकुशी ने देश की शैक्षिक संस्थाओं के शोषक, भेदभावकारी और निष्ठुर माहौल को फिर से बेपर्दा कर दिया है। तमिलनाडु में विल्लुपुरम के योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा कॉलेज की भारी फीस वसूली और सुविधाओं की नितांत कमी से तंग आकर तीन छात्राओं ने पास के एक कुएं में छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली। द्वितीय वर्ष की इन छात्राओं ने अपने मृत्युपूर्व पत्र में कहा कि उन्हें दूसरे वर्ष के पाठ्यक्रम में पास भी नहीं किया गया, जबकि कॉलेज वालों ने उनसे तीस से पचास हजार रुपए की फीस के बजाय पूरे कोर्स के छह लाख रुपए ऐंठ लिए। इतनी मोटी फीस वसूलने वाले कॉलेज का हाल यह है कि उसके मुर्दाघर में कभी भोजन कक्ष था, एक गंदा-सा छोटा कमरा आॅपरेशन थियेटर है, जिसमें तीन चारपाइयां पड़ी हैं। आठ साल पुराने इस एसएसवी कॉलेज आॅफ नेचुरोपैथी ऐंड योगा साइंसेज में तमाम मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं। इसके परिसर में सिर्फ एक स्थायी हिस्सा है जहां कक्षाओं और शिक्षकों के कमरे हैं, बाकी सब अस्थायी ढांचे हैं। कॉलेज में अस्पताल की कोई इमारत भी नहीं है, जबकि साइनबोर्ड पर यहां अस्पताल बताया गया है। कुल मिला कर इसे किसी भी लिहाज से एक मेडिकल कॉलेज का दर्जा नहीं दिया जा सकता। लेकिन प्रबंधन की पहुंच और संबद्ध अधिकारियों के वरदहस्त के चलते छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ और अभिभावकों की जेब में सेंधमारी का यह खेल बदस्तूर चलता रहा है। क्षेत्र के विधायक के मुताबिक यह कॉलेज नेचुरोपैथी कॉलेजों को नियंत्रित करने वाले आयुष मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा परिषद के सभी नियमों का उल्लंघन कर रहा है; उन्हें सूचना भी दी गई थी, कॉलेज का निरीक्षण भी किया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

आखिर कितने होनहार छात्रों की आत्महत्याओं के बाद हम बीमार मेडिकल कॉलेजों के इलाज की जरूरत महसूस करेंगे? ऐसी घटनाएं सामने आने पर हर बार जांच के नाम पर खानापूरी और मुआवजे की आड़ में लीपापोती कर दी जाती है। मगर भविष्य में छात्र-छात्राएं मौत को गले लगाने पर विवश न हों, इस दिशा में सुधारात्मक उपाय या प्रयास सिरे से नदारद रहते हैं। देश के सर्वोच्च और सर्वाधिक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान एम्स तक में मेडिकल छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं हुई हैं। यहां भी खुदकुशी करने वालों ने मृत्युपूर्व पत्र में गैर-पेशेवर माहौल और जातीय उत्पीड़न तक की बात कही थी। सबसे अफसोसनाक यह है कि निजीकरण की नीति के तहत जब से मेडिकल कॉलेजों में निजी क्षेत्र को प्रवेश की छूट मिली है तब से सभी मापदंडों को दरकिनार कर तमाम फर्जी कॉलेजों के मान्यता या संबद्धता हासिल कर लेने के मामले बढ़ते गए हैं। ऐसे-ऐसे कॉलेजों को मान्यता मिल जाती है जिनके पास न अपने कायदे के भवन हैं, न शिक्षक, न उपकरण, न प्रयोगशालाएं, न हॉस्टल, आदि। छात्रों या अभिभावकों की शिकायतों को या तो रद््दी की टोकरी में फेंक दिया जाता है या जांच के नाम पर खानापूर्ति करके मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। तमिलनाडु के उपर्युक्त कॉलेज की बाबत भी अनेक शिकायतें मुख्यमंत्री से लेकर राज्य के स्वास्थ्य सचिव को भेजी गई थीं। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई और 2008 से हर बार इसकी मान्यता-संबद्धता नवीनीकृत होती रही। क्या यह सब उच्चस्तरीय मिलीभगत और मुनाफे की बंदरबांट के बिना संभव है?

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