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ताइवान का संकट

इसमें कोई संदेह नहीं कि ताइवान का विवाद इसलिए भी ज्यादा गरमाया है कि अमेरिका बीच में कूदा हुआ है।

ताइवान का संकट

चीन और ताइवान के बीच जारी तनाव किसी युद्ध से कम नहीं लग रहा। पिछले हफ्ते अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद इस क्षेत्र में दोनों देशों के युद्धाभ्यास की कवायद बता रही है कि इस आग की लपटें फिलहाल शांत नहीं होने वालीं। पेलोसी के ताइवान पहुंचने के पहले अमेरिका और चीन ने एक दूसरे को जिस तरह की चेतावनियां दीं, उससे भी यह तो साफ हो चला था कि चीन-ताइवान विवाद अभी भड़केगा। इसीलिए पेलोसी के ताइवान से छोड़ते ही चीन ने जो आक्रामक रुख दिखाया और सैन्य गतिविधियों को अंजाम दिया, उसे युद्ध भले ही न कहा जाए, पर मतलब साफ था, ताइवान के साथ-साथ अमेरिका को भी धमकाना।

चीन के सत्ताईस लड़ाकू विमान ताइवान में घुस गए। इसके अलावा ताइवान की घेरेबंदी के लिए उसने दो जंगी बेड़े और पनडुब्बियां भी महासागर में तैनात कर दीं। जवाब में अब ताइवान भी युद्धाभ्यास कर रहा है। ये घटनाक्रम बता रहे हैं कि ताइवान के आसपास शांति नहीं है। चीन उस पर कब हमला कर बैठे, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। उधर, ताइवान का भी मनोबल जिस तरह से बढ़ा हुआ है, उससे साफ है कि वह चीन का डट कर मुकाबला करेगा। लेकिन जो हो, युद्ध के ऐसे हालात एशियाई शांति के बड़ा खतरा तो बन ही गए हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ताइवान का विवाद इसलिए भी ज्यादा गरमाया है कि अमेरिका बीच में कूदा हुआ है। वह शुरू से ताइवान के रक्षक की भूमिका में है। इसलिए भी कि इसमें उसके बड़े हित छिपे हैं। ताइवान हथियारों के लिए एक तरह से उस पर निर्भर है। ऐसे में अमेरिका हथियारों का इतना बड़ा खरीदार हाथ से कैसे जाने देना चाहेगा! कहना न होगा कि अमेरिका यही काम यूक्रेन में भी कर रहा है।

यूक्रेन रूस का मुकाबला करता हुआ जंग के मैदान में डटा रहे, इसके लिए वह उसे लगातार हथियार दे रहा है। वैसे चीन ताइवान पर हमला करता है या नहीं, यह एक अलग बात है। मगर जब-जब अमेरिका ने ताइवान की आड़ में चीन को घेरने रणनीति बनाई, यह विवाद कहीं ज्यादा गंभीर रूप लेता गया है। देखा जाए तो चीन-ताइवान का विवाद तो सात दशक से भी पुराना है। भले चीन उसे अपना हिस्सा बताता रहा हो, लेकिन हमले के नतीजों को वह भी अच्छी तरह समझता है। वरना वह कब का ही उस पर धावा बोल चुका होता!

गौरतलब है कि द्वीपों, समुद्री सीमाओं और जमीनी सीमाओं को लेकर चीन के कई देशों के साथ विवाद हैं। कहने को तो ताइवान पर लंबे समय तक जापान का भी कब्जा रहा। लेकिन आज ताइवान स्वतंत्र देश है। यों भी दुनिया में तमाम देश ऐसे हैं जो कभी न कभी किसी देश का हिस्सा रहे, पर कालातंर में इन देशों ने स्वतंत्र अस्तित्व हासिल कर लिया। इसलिए छोटे-छोटे द्वीपों और देशों पर अधिकार और कब्जे की मंशा रखने वाले महाबली देश अशांति का कहीं बड़ा कारण बनते जा रहे हैं। इसी से इन्होंने दुनिया में हथियारों का बड़ा बाजार भी खड़ा कर लिया। यह समझना होगा कि ताइवान के नाम पर सिर्फ खेमेबाजी बढ़ेगी। इस मुद्दे पर पाकिस्तान और रूस तो पहले से चीन के साथ खड़े हैं ही। पश्चिमी देश अमेरिका के दबाव में रहेंगे। ऐसे में खतरा यही है कि कहीं एशिया में भी एक और यूक्रेन न देखने को मिल जाए!

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