देश के महानगरों से लेकर छोटे कस्बों में जगह-जगह तरणताल बनाए जा रहे हैं, लेकिन वहां सुरक्षा मानकों को लेकर कोई गंभीरता नजर नहीं आती है। न तो इन परिसरों में प्रबंधन स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है और न ही शासन-प्रशासन की ओर से जांच एवं निगरानी की जरूरत महसूस की जाती है। इसी लापरवाही के कारण कई बार तैराकी के शौकीन बच्चों और युवाओं की भी जान चली जाती है।
ऐसी ही एक घटना राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वजीराबाद के जगतपुरी इलाके में सामने आई, जहां रविवार सुबह एक तरणताल में दस साल के बच्चे की डूबने से मौत हो गई। पुलिस जांच में सामने आया कि यह तरणताल बिना किसी अनुमति के व्यावसायिक तौर पर संचालित किया जा रहा था। यहां न तो किसी विशेषज्ञ तैराक की तैनाती की गई थी और न ही आपात स्थिति के लिए सुरक्षा के माकूल प्रबंध किए गए थे। इसे लापरवाही नहीं तो और क्या कहा जाएगा कि जो जांच-पड़ताल पहले की जानी चाहिए थी, वह बच्चे की मौत के बाद शुरू की गई।
सवाल है कि सुरक्षा मानदंडों का इस तरह से खुला उल्लंघन आखिर कैसे हो रहा है? क्या प्रशासनिक निगरानी एवं जांच तंत्र इतना कमजोर है कि कोई बिना अनुमति के ऐसी व्यावसायिक गतिविधियां संचालित कर सकता है, जिसमें किसी की जान जाने का जोखिम हो?
तरणताल में डूबने से मौत की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। उत्तर प्रदेश में कौशांबी के मंझनपुर में भी रविवार को तरणताल में नहाते समय एक युवक की डूबने से मौत हो गई। इसी तरह पिछले सप्ताह हरियाणा के जींद जिले में भी तरणताल में एक युवक की जान चली गई थी।
इन तीनों घटनाओं की जांच में यह बात निकलकर सामने आई है कि वहां सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही बरती गई। यही नहीं, दिल्ली के जगतपुरी में तो तरणताल बिना अनुमति के संचालित किया जा रहा था। जाहिर है, यह सब अधिकारियों की मिलीभगत से ही संभव हो सकता है। सरकार को ऐसे मामलों में नियमों को कड़ाई से लागू करने के साथ ही संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी चाहिए, ताकि बच्चों और युवाओं की जान के साथ खिलवाड़ न हो।
