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संपादकीयः इस्तीफा और इलहाम

बहुजन समाज पार्टी से स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के चलते स्वाभाविक ही उत्तर प्रदेश का सियासी तापमान चढ़ गया है। दो दिन पहले तक बसपा के राष्ट्रीय महासचिव रहे मौर्य ने ऐसे वक्त पार्टी छोड़ी है जब विधानसभा चुनाव को कोई सात महीने रह गए हैं।

Author June 24, 2016 03:33 am
बहुजन समाज पार्टी से स्वामी प्रसाद मौर्य

बहुजन समाज पार्टी से स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के चलते स्वाभाविक ही उत्तर प्रदेश का सियासी तापमान चढ़ गया है। दो दिन पहले तक बसपा के राष्ट्रीय महासचिव रहे मौर्य ने ऐसे वक्त पार्टी छोड़ी है जब विधानसभा चुनाव को कोई सात महीने रह गए हैं। इस्तीफे की घोषित वजह भी चुनाव से ही जुड़ी है। इस्तीफे के एलान के वक्त उन्होंने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए कहा कि वे दौलत की नहीं, दलित की बेटी हैं; आंबेडकर और कांशीराम की विचारधारा से भटक चुकी हैं। धन लेकर उम्मीदवार तय करने का आरोप मायावती पर पहले भी लगा था। टिकट की नीलामी की बात अब एक ऐसे शख्स ने कही है जो लंबे समय से पार्टी के अहम पदों पर रह चुका है। जाहिर है, दूसरे दल बसपा को घेरने के लिए मौर्य के इस्तीफे को भी हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।

लेकिन सवाल है कि स्वामी प्रसाद मौर्य टिकट बेचे जाने से आहत थे, तो उन्होंने पार्टी तब क्यों नहीं छोड़ी जब इस तरह का आरोप पहले लगा था? उन्हें यह इलहाम इतनी देर से क्यों हुआ? मायावती ने पलटवार करते हुए पूछा है कि अपने बेटे और बेटी को टिकट दिलाने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य ने कितना खर्च किया था? मायावती ने कहा है कि मौर्य पार्टी में रह कर वंशवाद चला रहे थे, जो उन्हें मंजूर नहीं था। पर सवाल है कि मायावती को यह वंशवाद तब क्यों नहीं खटका, जब उन्होंने मौर्य के बेटा-बेटी को टिकट देकर उपकृत किया था। जाहिर है, इस झगड़े में कोई भी नैतिक बढ़त का दावा नहीं कर सकता। इसलिए सारी चर्चा किसी नैतिक कोण से नहीं, सिर्फ इस लिहाज से हो रही है कि मौर्य के बसपा सेहटने का उत्तर प्रदेश की राजनीति खासकर अगले विधानसभा चुनाव पर क्या असर पड़ेगा।

स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा में गैर-यादव पिछड़ा वर्ग का चेहरा थे, और दलितों के बाद यही तबका बसपा की ताकत रहा है। इसलिए मौर्य को बसपा में खासी तवज्जो मिली तो इसके पीछे मायावती का सोचा-समझा गणित था। मौर्य का इस्तीफा निश्चय ही पार्टी के लिए एक तगड़ा झटका है। बाबू सिंह कुशवाहा भी इसी समुदाय से थे, पर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के घोटाले में फंसने के बाद बसपा ने उनसे पिंड छुड़ा लिया। फिर स्वामी प्रसाद मौर्य पार्टी के अघोषित रूप से ओबीसी चेहरा हो गए। बसपा के राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने से पहले वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। मीडिया से बातचीत के लिए मायावती ने उन्हें ही अधिकृत कर रखा था।

विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर भी वे सपा सरकार पर हमला बोलते रहते थे। मौर्य ने लोकदल के कार्यकर्ता के तौर पर राजनीति में कदम रखा था, फिर वे जनता दल से होते हुए बसपा में गए। जनता दल के प्रदेश महामंत्री रहते हुए उन्होंने सपा से उसके गठजोड़ पर सख्त एतराज किया था, और विरोध में पार्टी छोड़ दी थी। यह दिलचस्प है कि आज उसी सपा में उनके शामिल होने की अकटलें लगाई जा रही हैं। वे सपा में शामिल हों या न हों, बसपा को नुकसान पहुंचाने की भरसक कोशिश करेंगे। जबकि बसपा के लिए चिंता की एक बात पहले से मौजूद है कि केशव प्रसाद मौर्य को अपना प्रदेश अध्यक्ष बना कर भाजपा भी पिछड़ा वर्ग में अपना आधार बढ़ाने में जुटी हुई है।

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