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संपादकीयः जांच का दायरा

अफसोस की बात यह है कि सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद से अब तक इस मामले में बॉलीवुड से लेकर राजनीति की दुनिया में जितने ध्रुव खड़े हो गए और उनके बीच जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप सामने आए, वे मामले की हकीकत को सामने लाने में मददगार नहीं थे।

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए।

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला शुरू से जिन परतों में उलझा दिखा, उसमें हर पहलू से बारीक जांच ही उसे सुलझा सकती है। इसलिए आत्महत्या और उससे जुड़ी संदिग्ध परिस्थितियों के मद्देनजर इसकी जांच महाराष्ट्र की पुलिस के बजाय सीबीआइ से कराने की मांग उठ रही थी। हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की पुलिस की जांच पर भरोसा करना बेहतर समझा था। लेकिन जब पटना में सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने एफआइआर दर्ज कराई और सीबीआइ जांच की मांग की, तब बिहार सरकार ने इसे स्वीकार करते हुए सीबीआइ से जांच की सिफारिश कर दी। अफसोस की बात यह है कि इस मसले पर जहां महाराष्ट्र और बिहार की सरकार और पुलिस को मिल कर मामले सुलझाने की ओर बढ़ना चाहिए था, वहां शायद इसे अहं और टकराव का सवाल बना लिया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और बुधवार को आखिर शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में समूचे मामले की जांच सीबीआइ से कराने का आदेश दिया। इससे एक तरह से बिहार सरकार के रुख की पुष्टि हुई है।

हैरानी की बात यह है कि जिस मामले में संबंधित राज्यों की पुलिस और तंत्र को अपनी ओर से रुचि लेकर ड्यूटी के तहत जांच को पारदर्शी तरीके से कराने की व्यवस्था करनी चाहिए थी, उसमें अघोषित रूप से कई पक्ष बन गए और उनके बीच आपस में खींचतान चलने लगी। जहां महाराष्ट्र सरकार इसमें सीबीआइ जांच की जरूरत नहीं समझ रही थी, वहीं बिहार सरकार का रुख इससे उलट सामने आया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि बिहार और महाराष्ट्र की सरकारें इस मामले में जितना अधिक संभव हो सके, सीबीआइ जांच में सहयोग करें, ताकि इससे जुड़ी सारी परतों का खुलासा हो सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद इसे अलग-अलग पक्षों की ओर से जिस तरह अपनी मांग या फिर न्याय की जीत के तौर पर पेश करने की होड़ मच गई, उसे अपरिपक्व प्रतिक्रियाओं के रूप में देखा जा सकता है। जबकि फिलहाल जरूरत इस बात की है कि सीबीआइ जांच को निर्बाध तरीके अंजाम तक पहुंचने दिया जाए, संबंधित पक्ष में इसमें सहयोग करें और जांच के निष्कर्षों का इंतजार किया जाए।

अफसोस की बात यह है कि सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद से अब तक इस मामले में बॉलीवुड से लेकर राजनीति की दुनिया में जितने ध्रुव खड़े हो गए और उनके बीच जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप सामने आए, वे मामले की हकीकत को सामने लाने में मददगार नहीं थे। बल्कि ऐसे में आरोप और संदेह की नई परतें बन गईं, जिससे लोगों को अपनी सुविधा के मुताबिक धारणाएं बनाने का मौका मिला। यहां तक कि इस मामले को कुछ राजनीतिकों ने अपनी सुविधा का मुद्दा बनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। क्या सुशांत सिंह राजपूत के परिवार को इंसाफ इस रास्ते दिलाया जा सकेगा? बॉलीवुड में जिस तरह वंशवाद या परिवारवाद का बोलबाला रहा है, उसमें नए कलाकारों को अपनी जगह बनाने के लिए किस तरह के संघर्षों से गुजरना पड़ता है, यह छिपा नहीं है। प्रतिद्वंद्विता, खींचतान और नाकामी से लेकर चकाचौंध के बीच अकेले पड़ जाने और अवसाद से घिर जाने के हालात भी उन कलाकारों के लिए बड़ी चुनौती होती है। इसके अलावा, किसी की मौत में साजिश और रहस्य की क्या भूमिका है, यह बिना बारीक जांच के सामने आना संभव नहीं है। इसलिए बेहतर है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में कोई पूर्वधारणा बनाने के बजाय अब सीबीआइ की जांच के नतीजों और फिर इससे जुड़े मुकदमे में अदालत के फैसले का इंतजार किया जाए।

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