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संपादकीय: वापसी का संकट

पिछले दो महीने में प्रवासी मजदूरों को जिस तरह की शारीरिक और मानसिक पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ा है, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट भी भीतर से हिल गया है। इसीलिए स्वत: संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च अदालत को कई सख्त आदेश देने को मजबूर होना पड़ा।

Author Published on: June 11, 2020 1:15 AM
Corona Virus, Migrant Laborsकोरोना वायरस के चलते लागू लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों का अपने गृह राज्यों की तरफ लौटने का सिलसिला जारी है। (फोटो-विडियो स्क्रीनशॉट)

प्रवासी मजदूरों की घर वापसी और रोजगार के मुद्दे पर देश की सर्वोच्च अदालत को केंद्र और राज्य सरकारों को जो निर्देश देने पड़े हैं, वे हमारी सरकारों की विफलता की तस्वीर भी बताते हैं। अगर सरकारें सजग और संवेदनशील होतीं और सुव्यवस्थित तरीके से कदम उठातीं, तो देश के करोड़ों प्रवासी मजदूरों को यातनाओं के दौर से नहीं गुजरना पड़ता।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के लिए यह शर्मनाक इसलिए भी है कि देश के इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर बेहद गरीब तबके का पलायन कभी नहीं देखा गया, और वह भी सिर्फ सरकार की अदूरदर्शिता की वजह से। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि इक्कीसवीं सदी के उस देश में जो दुनिया की बड़ी और ताकतवर अर्थव्यवस्था बनने के सपने देख रहा है, वहां उद्योगों की रीढ़ माने जाने वाले प्रवासी कामगारों को रोटी-और पैसे के लिए इस तरह मोहताज होना पड़ेगा।

पिछले दो महीने में प्रवासी मजदूरों को जिस तरह की शारीरिक और मानसिक पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ा है, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट भी भीतर से हिल गया है। इसीलिए स्वत: संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च अदालत को कई सख्त आदेश देने को मजबूर होना पड़ा।

अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को स्पष्ट हिदायत दी है कि वे पंद्रह दिन के भीतर प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाएं। अभी भी लाखों प्रवासी कामगार देश के कई शहरों में फंसे पड़े हैं और घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन लौट इसलिए नहीं पा रहे हैं कि उनके पास न तो किराया है, न घर लौटने के लिए बस, ट्रेन जैसे पर्याप्त इंतजाम सरकारें कर पा रही हैं। लाखों लोग तो कई दिनों तक पैदल चल कर भूखे-प्यासे अपने गांवों को पहुंचे। अदालत के इस फैसले के बाद रेलवे और राज्य सरकारें सक्रिय हुई हैं।

हालांकि लाखों को मजदूरों को जल्द ही उनके घर पहुंचा पाना आसान इसलिए नहीं है क्योंकि हमारा सरकारी तंत्र एक तरह से पंगु हो चुका है, इतना बड़ा काम उसके बूते के बाहर है। रेलवे स्टेशनों से लेकर ट्रेन तक में प्रवासी मजदूरों की जो दुर्गति हुई है, वह किसी से छिपी नहीं है। बिना पानी और खाने के लोगों ने तीन-तीन दिन की यात्रा की है। साथ ही, प्रवासी कामगारों की आड़ में जिस तरह की क्षुद्र राजनीति सरकारों और राजनीतिक दलों के बीच देखने को मिली, वह भी अफसोसजनक है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सर्वोच्च अदालत ने प्रवासी कामगारों को उनके घर पहुंचाने के साथ ही उन्हें रोजगार मुहैया कराने के लिए भी सरकारों को निर्देश दिया है। इसके लिए ब्लॉक और जिला स्तर पर मजदूरों का ब्योरा जुटा कर उसके अनुरूप रोजगार दिलाना अब सरकारों की जिम्मेदारी होगी। अगर कोई कामगार अपने पुराने काम पर लौटना चाहेगा तो उसे वह विकल्पप भी दिया जाएगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्य सरकारों के लिए यह चुनौतीभरा काम है, लेकिन यह सरकारों का दायित्व तो है ही, जिसे भुला दिया गया और मजदूरों को जहां-तहां उनके उनके हाल पर छोड़ दिया गया। जब देश में पूर्णबंदी लागू की गई थी, तब प्रधानमंत्री ने सभी नियोक्ताओं से अपील की थी कि वे अपने यहां से काम करने वालों की छंटनी न करें, न ही उनका वेतन काटें। लेकिन हुआ इसका उलट, इसीलिए कामगारों को घर लौटने को मजबूर होना पड़ा। इससे यह भी साफ हो गया है कि प्रवासी मजदूरों का यह संकट उनकी इस हताशा और अविश्वास से खड़ा हुआ कि हमारी सरकारें नाकाम हैं जो उन्हें नहीं बचा पाएंगी। इसलिए घर लौटना ही बेहतर है।

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