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संपादकीयः बेटी का हक

ब सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि पिता की संपत्ति में बेटी को बराबर का अधिकार दिए जाने में यह शर्त लागू नहीं होगी कि पिता की मृत्यु कब हुई।

अदालत ने साफ लहजे में कहा कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी का बेटे के बराबर हक है।

हमारे देश में बराबरी के तमाम दावों के बावजूद स्त्रियों को अपने अधिकार हासिल करने के लिए बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर बेटी को भी अधिकार मिलना चाहिए, इसे लेकर भारतीय समाज में एक तरह से नकार भाव ही रहा है। हालांकि कानून के मुताबिक करीब पंद्रह साल पहले बेटियों को पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर हक सुनिश्चित किया था। लेकिन अब भी उसे लेकर कई स्तरों पर विवाद जारी था। अब मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में एक बड़ा फैसला दिया है और इससे एक तरह से सारी उलझनें साफ हो गई हैं। अदालत ने साफ लहजे में कहा कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी का बेटे के बराबर हक है, थोड़ा-सा भी कम नहीं; जन्म के साथ ही बेटी पिता की संपत्ति में बराबर की हकदार हो जाती है। इसके अलावा, अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भले ही पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 के लागू होने के पहले हो गई हो, फिर भी बेटियों को माता-पिता की संपत्ति पर बराबर अधिकार होगा। जाहिर है, यह न केवल संपत्ति में समान अधिकार के, बल्कि बराबरी की लड़ाई के लिहाज से भी महिलाओं के हक में बेहद अहम फैसला है।

दरअसल, पिता की संपत्ति में बेटी को भी बेटों के बराबर अधिकार है या नहीं, इसे लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। कानून के स्तर पर हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 लागू रहा, जिसमें बेटियों को पिता की संपत्ति में अधिकार नहीं था। मगर लगातार सामाजिक-राजनीतिक बहसों का सकारात्मक नतीजा यह सामने आया कि सन 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन किया गया और बेटियों को भी पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार दिया गया। लेकिन उसमें नुक्ता यह लगा दिया गया कि अगर पिता की मृत्यु नौ सितंबर, 2005 से पहले हो गई हो तब बेटी को यह अधिकार नहीं मिल सकेगा। इस मसले पर लंबे समय से बहस चल रही थी, लेकिन यह नियम अब तक बहाल रहा। अब सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि पिता की संपत्ति में बेटी को बराबर का अधिकार दिए जाने में यह शर्त लागू नहीं होगी कि पिता की मृत्यु कब हुई।

यों एक लोकतांत्रिक समाज अपनी ओर से यह प्रयास करता है कि किसी भी स्तर पर पल रहे भेदभाव को खत्म किया जाए, वह चाहे जाति या वर्ग के आधार पर हो या फिर लैंगिक बुनियाद पर। बराबरी की तमाम कानूनी व्यवस्थाओं के बावजूद हमारे देश में अब भी स्त्रियों को कई ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है, जिसमें उन्हें अधिकार की लड़ाई अलग से लड़नी पड़ती है। यह मुश्किल कई बार तब भी खड़ी हो जाती है जब कानून उनके पक्ष में होता है। संपत्ति में बराबरी का अधिकार तो काफी आगे का सवाल है, जन्म के बाद से ही परिवार से लेकर समाज तक में हर स्तर पर उन्हें जिस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है, उसे किसी सभ्य समाज की खासियत नहीं कहा जा सकता। दरअसल, सारी समस्या समाज के समूचे ढांचे पर हावी पितृसत्तात्मक आग्रहों की है, जिसमें बेटे और बेटी के बीच भेदभाव को सहज स्वीकार्यता हासिल है। यह प्रवृत्ति ऐसी रिवायत और लोगों की मानसिकता का हिस्सा रही है जिसमें दावा भले ही उच्चतर सांस्कृतिक परंपराओं किया जाता हो, लेकिन इंसानियत की कसौटी पर इसे भेदभावपरक मूल्य ही कहा जाएगा। एक सभ्य समाज ऐसी गैरबराबरी को खत्म करने की पहलकदमी करता है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले की अहमियत को इसी लिहाज से देखा जा सकता है।

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