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संपादकीयः मुश्किल में ताज

ताजमहल के संरक्षण में लापरवाही के मसले पर देश की शीर्ष अदालत ने जो टिप्पणी की है, वह सरकार और एएसआइ यानी भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के लिए शर्मिंदगी का कारण होना चाहिए।

Author July 13, 2018 4:16 AM
सुप्रीम कोर्ट ने टीटीजेड यानी ताज ट्रैपेजियम जोन में लोगों के आज भी उद्योग के लिए आवेदन करने और उन पर विचार किए जाने पर एक बार फिर सवाल उठाया।

ताजमहल के संरक्षण में लापरवाही के मसले पर देश की शीर्ष अदालत ने जो टिप्पणी की है, वह सरकार और एएसआइ यानी भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के लिए शर्मिंदगी का कारण होना चाहिए। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि देश की जो ऐतिहासिक धरोहर विश्व भर में एक खास जगह रखती है, यूनेस्को की सूची में जिसे दुनिया का दूसरा सर्वश्रेष्ठ स्मारक माना गया है, उसके संरक्षण के सवाल पर सरकार और संबंधित महकमे इस कदर उदासीन हैं। समय-समय पर पुरातत्त्वविदों ने ताजमहल में छीजन को लेकर चेतावनी जारी की, अदालत ने सख्त टिप्पणियां की हैं, लेकिन उन्हें गंभीरता से लेना जरूरी नहीं समझा गया। सरकार के इसी रवैये से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यहां तक कहा कि वह ताजमहल को संरक्षण दे या उसे बंद कर दे या फिर उसे जमींदोज कर दिया जाए। अदालत की टिप्पणी अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि ताजमहल को लेकर सरकार और उसकी देखरेख करने वाले एएसआइ ने किस स्तर की लापरवाही बरती है। यह बेवजह नहीं है कि लंबे समय से संरक्षण के सवाल पर टालमटोल की वजह से ताजमहल पर बढ़ता संकट आज गंभीर हो चुका है।

विचित्र यह भी है कि सवालों के घेरे में आए एएसआइ ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि ताजमहल पर काई उड़ कर जमा हो रही है। इसलिए स्वाभाविक ही अदालत ने कहा कि क्या काई के पास पंख होते हैं जो वह उड़ कर ताजमहल पर जाकर बैठ जाती है; अगर एएसआइ का यही जवाब है तो केंद्र सरकार को ताजमहल के रखरखाव के लिए दूसरे विकल्प की तलाश करनी होगी। यह एक तरह से ऐतिहासिक धरोहरों की देखरेख और रखरखाव के लिए जिम्मेदार किसी महकमे की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान है कि दो दशक से ज्यादा वक्त में भी उसके पास ताजमहल को उसके मूल रूप में सुरक्षित रखने की कार्ययोजना नहीं है और आज भी वह काई के उड़ कर बैठने जैसी बचकानी दलीलें पेश कर रहा है। एक खबर के मुताबिक पिछले दो सालों के दौरान एएसआइ ने जहां केवल अपना आलीशान दफ्तर बनाने में तीन सौ पांच करोड़ रुपए खर्च किए, वहीं कुल तीन हजार छह सौ छियासी संरक्षित स्मारकों पर उसने महज दो सौ छह करोड़ रुपए खर्च किए।

सुप्रीम कोर्ट ने टीटीजेड यानी ताज ट्रैपेजियम जोन में लोगों के आज भी उद्योग के लिए आवेदन करने और उन पर विचार किए जाने पर एक बार फिर सवाल उठाया। ताजमहल के आसपास के इलाकों में पहले ही बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयां मौजूद हैं। फिर, आगरा में आम नागरिकों के साथ-साथ नगर निगम भी कचरे को जलाना ही शायद उसका एकमात्र हल मानता है। इन सबसे निकलने वाले धुएं और प्रदूषण ने ताजमहल के रंग को बुरी तरह प्रभावित किया है। उसके पीला और हरा पड़ने तक की बातें सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद टीटीजेड के क्षेत्र में नए उद्योग लगने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई गई है। पेरिस में एफिल टावर को देखने दुनिया भर से आठ करोड़ लोग हर साल पहुंचते हैं, वहीं ताजमहल को देखने आने वालों की तादाद लगभग पचास लाख है। जबकि पुरातत्त्व से लेकर उसके महत्त्व के लिहाज से ताजमहल को एफिल टावर से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण दर्जा हासिल है। ताजमहल के संरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 1996 में आदेश जारी किया था। लेकिन आज भी अगर हालात में कोई सुधार नहीं हुआ, तो इसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है?

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