लोकतंत्र में किसी भी चुनाव की शुचिता इस बात पर निर्भर करती है कि जनप्रतिनिधि के चयन की प्रक्रिया कितनी संवैधानिक, निष्पक्ष और पारदर्शी है। यह तभी सुनिश्चित हो पाता है, जब मतदाता चुनाव में मतदान की वास्तविक पात्रता रखते हों और तमाम चुनावी कार्य स्वतंत्र तरीके से संपन्न कराए जाएं।
इसकी जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग पर होती है और वह समय-समय पर मतदाता सूची में संशोधन करता रहता है, ताकि जो व्यक्ति मतदान के लिए पात्र नहीं है या जिनका निधन हो चुका है, उनके नाम सूची से हटा दिए जाएं। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है, मगर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि कुछ राज्यों में पिछले दिनों इसे लेकर कई तरह के विवाद खड़े हो गए।
यहां तक कि इसके औचित्य पर भी सवाल उठाए गए। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को अपने फैसले में कहा कि निर्वाचन आयोग को एसआइआर कराने का पूरा अधिकार है और यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व में जान फूंकती है। स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से चुनाव की अनिवार्यता को आगे बढ़ाने में यह महत्त्वपूर्ण कड़ी है।
गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व राज्य में शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सबसे पहले सवाल उठे थे। विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया के समय को लेकर प्रश्न उठाया था। उनका कहना था कि चुनाव से ठीक पहले ही यह प्रक्रिया क्यों शुरू की गई, जबकि निर्वाचन आयोग इसे एक साल पूर्व भी करवा सकता था। इसके बाद आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाणपत्र स्वीकार नहीं करने को लेकर भी विवाद हुआ, जो सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और अंतत: निर्वाचन आयोग को इस मामले में अपने कदम पीछे खींचने पड़े।
इसके बाद सवालों का यह सिलसिला उत्तर प्रदेश से होते हुए पश्चिम बंगाल तक पहुंचा और शीर्ष अदालत को फिर इसमें दखल देना पड़ा। बिहार में एसआइआर को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनका निपटारा करते हुए न्यायालय ने कहा कि निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) की धारा 21(3) के तहत विशेष पुनरीक्षण करने का अधिकार प्राप्त है।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाना इस बात की कानूनी घोषणा नहीं है कि कोई व्यक्ति इस देश का नागरिक नहीं है। इससे उन लोगों को निश्चित तौर पर राहत मिली है, जिनके नाम तकनीकी कारणों से मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और अब उन्हें इस बात की चिंता सताने लगी है कि कहीं आगे चलकर उनकी नागरिकता खतरे में न पड़ जाए। यह बात सच है कि चुनावों की शुचिता को बरकरार रखने के लिए मतदाता सूची में संशोधन जरूरी है, लेकिन कोई पात्र व्यक्ति तकनीकी कारणों से मताधिकार से वंचित न हो, इसकी जिम्मेदारी भी निर्वाचन आयोग की ही है।
पिछले दिनों बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में जिस तरह से लाखों लोग मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद मतदान नहीं कर पाए, वह वास्तव में चिंताजनक है। हालांकि, मताधिकार से वंचित होने की स्थिति रोकने के लिए शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया है कि नागरिकता के आधार पर हटाए गए सभी नामों के मामलों को चार सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए और उन्हें अगले विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले अपना निर्णय देना होगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर (Special Intensive Revision) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। अदालत ने माना है कि यह प्रक्रिया संविधान और कानून के अनुरूप है। आसान शब्दों में समझे तो अदालत का मानना है कि एसआईआर कराना चुनाव आयोग का अधिकार है और इससे मतदाता सूची को सही और पारदर्शी बनाए रखने में मदद मिलती है। यह एक वैध और संवैधानिक प्रक्रिया है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने कानून के हिसाब से SIR किया और प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है। EC ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल नहीं किया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
