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संपादकीयः पानी और आग

एक बार फिर कावेरी के मसले पर केंद्र को सर्वोच्च न्यायालय की फटकार सुननी पड़ी है। अगर दो या इससे अधिक राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे का विवाद हो, तो स्वाभाविक ही केंद्र से यह अपेक्षा की जाती है कि उसकी मध्यस्थता से सौहार्दपूर्ण समाधान निकाल आएगा।

Author April 11, 2018 5:20 AM
सुप्रीम कोर्ट। (express photo)

एक बार फिर कावेरी के मसले पर केंद्र को सर्वोच्च न्यायालय की फटकार सुननी पड़ी है। अगर दो या इससे अधिक राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे का विवाद हो, तो स्वाभाविक ही केंद्र से यह अपेक्षा की जाती है कि उसकी मध्यस्थता से सौहार्दपूर्ण समाधान निकाल आएगा। लेकिन यह उम्मीद न सतलुज के मामले में पूरी हो पाई है न कावेरी के मामले में। कावेरी के मामले में तो हद यह है कि सर्वोच्च अदालत के बताए समाधान पर अमल करने में भी केंद्र ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। गौरतलब है कि अदालत ने सोलह फरवरी के अपने आदेश में कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुदुच्चेरी के बीच कावेरी के पानी के बंटवारे पर निगरानी रखने के लिए केंद्र को कावेरी प्रबंधन बोर्ड गठित करने को कहा था।

इसकी समय-सीमा थी उनतीस मार्च। लेकिन केंद्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। और समय-सीमा निकल गई, तो अदालत में उसके आदेश की बाबत स्पष्टीकरण के लिए याचिका डाल दी। इस पर अदालत का कुपित होना स्वाभाविक था। आखिर स्पष्टीकरण चाहिए था, तो इसके लिए अनुरोध डेढ़ महीने गुजर जाने पर क्यों? याचिका में आदेश को और स्पष्ट करने के अनुरोध के साथ यह मांग भी की गई थी कि निगरानी तंत्र गठित करने के लिए तीन महीने का वक्त दिया जाए। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि तीन महीने की अवधि मांगने के पीछे क्या मंशा रही होगी।

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कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी का पानी एक बहुत संवेदनशील मसला रहा है और इस पर दोनों राज्यों में जब-तब सियासी उबाल आता रहा है। इन दिनों एक तरफ तमिलनाडु में कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन और बंद आयोजित होते रहे हैं, तो दूसरी तरफ कर्नाटक में चुनावी माहौल है। केंद्र को यह डर सता रहा होगा कि बोर्ड के गठन की घोषणा से कहीं भाजपा को चुनावी नुकसान न उठाना पड़े; अगर तीन महीने की मोहलत मिल जाए तो यह खतरा नहीं रहेगा! वरना सर्वोच्च अदालत के सोलह फरवरी के आदेश में ऐसा कुछ नहीं था कि स्पष्टीकरण की जरूरत पड़े, और वह भी छह हफ्तों बाद! अदालत ने तथ्यों की विस्तृत पड़ताल के बाद दिए अपने आदेश में तमिलनाडु के हिस्से में थोड़ी-सी कमी कर दी, सिर्फ 14.75 टीएमसी फीट की, और इतनी ही बढ़ोतरी कर्नाटक के हिस्से में की, बेंगलुरु और मैसुरु में पेयजल संकट के मद्देनजर। फैसले के मुताबिक केरल और पुदुच्चेरी को पहले जितना ही पानी मिलता रहेगा। यह फैसला पंद्रह साल के लिए है।

अदालत ने तमिलनाडु के हिस्से में थोड़ी-सी कमी भले की हो, पर केंद्र को कावेरी प्रबंधन बोर्ड गठित करने का आदेश देकर जो तजवीज की है वह तमिलनाडु के हित में ही है। बोर्ड का गठन होने से यह बराबर सुनिश्चित होता रहेगा कि तमिलनाडु को उसके हिस्से का पानी मिलता रहेगा। यह फिलहाल नहीं हो पाया है तो केंद्र की निष्क्रियता या आनाकानी की वजह से। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र अब अदालत के आदेश को अमली जामा पहनाने के काम में जुटेगा। अदालत ने बोर्ड के गठन में देरी के लिए केंद्र को खरी-खोटी सुनाने के साथ ही बाकी पक्षों से यह उम्मीद जताई है कि वे फैसले के क्रियान्वयन में बाधा नहीं डालेंगे, और शांति बनाए रखेंगे। कावेरी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में बहुत बार आग भड़काई गई है। विवाद को और तूल देने तथा और लंबा खींचने के बजाय अब सर्वोच्च अदालत के फैसले को शांतिपूर्वक लागू करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

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