अस्पताल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का महत्त्वपूर्ण केंद्र होते हैं। इसी आधार पर निजी अस्पतालों के निर्माण के लिए सरकार की ओर से रियायती दर पर जमीन उपलब्ध कराई जाती है। मगर इसमें कुछ नियम-शर्तें भी लागू होती हैं, जिनमें आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों के लिए तयशुदा सीमा में मुफ्त इलाज की सुविधा भी शामिल है।

मगर इन नियमों का पूरी तरह पालन हो रहा है या नहीं, इसकी चिंता शायद ही सरकार या अस्पताल प्रबंधन को होती है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली के 51 अस्पतालों को नोटिस भेजकर नियमों का पालन नहीं करने पर कारण स्पष्ट करने को कहा है। साथ ही पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए।

ऐसे में सवाल है कि जो जिम्मेदारी सरकार की है, वह कार्य शीर्ष अदालत को क्यों करना पड़ रहा है? आखिर क्या वजह है कि नियमों की अनदेखी को सरकारी तंत्र में गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है?

दरअसल, केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में एक नीति लागू की थी, जिसके तहत दिल्ली में गरीब लोगों के लिए निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा का प्रावधान था। इसके मुताबिक, निजी अस्पतालों के निर्माण के लिए इस आधार पर रियायती दर पर जमीन उपलब्ध कराई जाएगी कि उनके आंतरिक रोगी विभाग में कम-से-कम दस फीसद और बाह्य रोगी विभाग में पच्चीस फीसद गरीबों का निशुल्क उपचार किया जाएगा।

वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने रियायत पर जमीन लिए दिल्ली के सभी निजी अस्पतालों को सरकार के इन नियमों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद अगर कोताही बरती जा रही है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

जाहिर है, निजी अस्पतालों में नियमों के अनुसार गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें, यह सुनिश्चित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की है। और अगर अदालती निर्देश के बाद भी सरकारी तंत्र तथा निजी अस्पताल इस मसले को गंभीरता से नहीं लेते हैं, तो इसे किस रूप में देखा जाएगा? ऐसे में जरूरी है कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए, ताकि व्यवस्था पर आम लोगों का भरोसा बना रहे।