अगर किसी नागरिक को न्याय पाने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़े, तो आखिर उसका क्या महत्त्व रह जाता है! माना जाता है कि समय पर न्याय न मिलना अन्याय के समान होता है। मगर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि देश में बड़ी संख्या में लोगों को इस तरह के संकट का सामना करना पड़ता है। न्याय में देरी के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें लंबित मामलों का बोझ, न्यायाधीशों की कमी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया भी शामिल है। मगर, जब अदालती कार्यवाही पूरी होने के बाद भी वर्षों तक न्याय के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े, तो उसे किस रूप में देखा जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में ऐसे ही तीन आपराधिक मामले इलाहाबाद उच्च न्यायालय से अपने पास स्थानांतरित किए हैं। इन मामलों में उच्च न्यायालय ने छह वर्ष पहले फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिन पर अब तक निर्णय नहीं सुनाया गया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्याय में हो रही असाधारण देरी से पीड़ित पक्ष के त्वरित न्याय के अधिकार पर सीधा असर पड़ रहा है।

किसी भी नागरिक को न्यायपालिका पर पूरा भरोसा होता है कि उसे न्याय अवश्य मिलेगा। मगर न्याय में देरी पीड़ितों को न केवल आर्थिक, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से भी नुकसान पहुंचाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसले में माना है कि समय पर न्याय न मिलना कानून के शासन के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

यह सच है कि देश में लंबित मुकदमों का बोझ भी समय पर न्याय न मिलने का एक बड़ा कारण है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2025 तक देश भर की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। माना जाता है कि न्यायाधीशों की कमी और लंबी एवं जटिल न्यायिक प्रक्रिया की वजह से भी मामलों की सुनवाई में देरी होती है।

ऐसे में सरकार और न्यायपालिका को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मुकदमों की बढ़ती संख्या के लिहाज से न्यायाधीशों की कमी को दूर किया जाए, न्यायिक प्रक्रिया को सुलभ एवं सरल बनाया जाए और अदालती कार्यवाही पूरी होने पर न्याय में किसी तरह की देरी न हो, ताकि न्यायपालिका पर आम लोगों का भरोसा कायम रहे।