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संपादकीयः दिल्ली का दरबार

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब दिल्ली में उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच चली आ रही रस्साकशी थम जाएगी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार आरोप लगा रहे थे कि उपराज्यपाल उन्हें काम नहीं करने दे रहे।

Author July 5, 2018 6:54 AM
अब दिल्ली सरकार का कामकाज उपराज्यपाल की दखलंदाजी से मुक्त हो गया है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब दिल्ली में उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच चली आ रही रस्साकशी थम जाएगी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार आरोप लगा रहे थे कि उपराज्यपाल उन्हें काम नहीं करने दे रहे। उन्हें एक चपरासी तक नियुक्त करने का अधिकार नहीं है। जब से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है, लगातार उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच किसी न किसी बात को लेकर तकरार चलती रही है। जाहिर है, इससे प्रशासनिक कामकाज बाधित होता है। पहले उपराज्यपाल नजीब जंग के साथ तनातनी बनी रही और फिर अनिल बैजल आए, तो उनके साथ भी सरकार का तालमेल सही नहीं बैठ पाया। उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच शुरू से ही अधिकारों को लेकर विवाद बना रहा। इसे लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की गई। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के वास्तविक प्रशासक हैं और उनके फैसलों को मानना दिल्ली सरकार की बाध्यता है। इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। उसी पर यह निर्णय आया है।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक दिल्ली सरकार अपने फैसले खुद करने को स्वतंत्र है। उपराज्यपाल उसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगे। सरकार सिर्फ उन्हें अपने फैसलों से अवगत कराएगी, पर उपराज्यपाल उसमें किसी तरह के संशोधन का सुझाव नहीं देंगे। चूंकि सरकार के मंत्री चुने हुए प्रतिनिधि हैं, इसलिए उनके फैसलों पर अगर अपरिहार्य स्थिति में कोई असहमति जतानी पड़ेगी, तो उपराज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेज सकते हैं। इस तरह सरकार और उपराज्यपाल कार्यालय के बीच चली आ रही तनातनी के चलते जो विकास कार्य रुक गए थे, दिल्ली सरकार की योजनाएं ठप पड़ी हुई थीं, वे सुचारु रूप से संचालित हो सकेंगी।

अभी तक दिल्ली सरकार को नौकरशाहों की तैनाती तक के लिए उपराज्यपाल से अनुमति लेनी पड़ रही थी, जिसमें कई बार असहमति उत्पन्न हुई, तो खींचतान बढ़ गई। यहां तक कि दिल्ली सरकार के मंत्रालयों में तैनात अधिकारी मंत्रियों का आदेश मानने के बजाय उपराज्यपाल के आदेश का पालन कर रहे थे। इस तरह योजनाएं अधर में लटकी हुई थीं। इस साल फरवरी में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मामले में नौकरशाहों ने मुख्यमंत्री का फैसला मानने से इनकार कर दिया, तो आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं और मुख्य सचिव के बीच हिंसक झड़प तक की नौबत आ गई थी। इस पर नाराजगी जताते हुए सारे प्रशासनिक अधिकारी हड़ताल पर चले गए और यह हड़ताल पिछले महीने तब समाप्त हो पाई, जब मुख्यमंत्री ने उपराज्यपाल के कार्यालय में धरना दिया।

अब दिल्ली सरकार का कामकाज उपराज्यपाल की दखलंदाजी से मुक्त हो गया है। इसे आम आदमी पार्टी की विजय के रूप में नहीं, बल्कि सरकारी कामकाज में आ रही अड़चनें दूर हो जाने के रूप में देखा जाना चाहिए। अब चुनौतियां अरविंद केजरीवाल सरकार के सामने हैं कि वह बचे हुए कार्यकाल में अपने वादों को कितना पूरा कर पाती है। अभी तक वह इस बात की आड़ लेती आ रही थी कि उसे काम नहीं करने दिया जा रहा, पर अब वह आड़ खत्म हो गई है। अब शायद उन्हें यह आरोप लगाने और उसका राजनीतिक लाभ लेने का भी मौका नहीं मिलेगा कि केंद्र सरकार उनके साथ वैमनस्यतापूर्ण व्यवहार कर रही है। पहले ही पार्टी में अंदरूनी झगड़े हैं, कई विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, ऐसे में अगर अरविंद केजरीवाल अपना प्रशासनिक प्रदर्शन बेहतर नहीं करते, तो उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी ही।

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