चिकित्सा पेशे की सबसे बुनियादी और प्राथमिक शर्त यही होनी चाहिए कि एक चिकित्सक किसी घायल व्यक्ति का बिना किसी औपचारिकता की मांग किए तुरंत इलाज करे और सबसे पहले उसका जीवन बचाने की कोशिश करे। विडंबना यह है कि कई बार अस्पताल और वहां मौजूद डाक्टर घायल मरीज को तुरंत उपचार मुहैया कराने के बजाय टालमटोल करते हैं या फिर मना कर देते हैं। नतीजतन, सिर्फ इलाज न मिलने की वजह से बच सकने वाले व्यक्ति की भी मौत हो जाती है।

सवाल है कि ऐसी स्थिति में पीड़ित की मौत के लिए किसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। गौरतलब है कि बीते मार्च में बलात्कार की शिकार हुई महज चार साल की एक बच्ची को बुरी तरह घायल अवस्था में गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों में ले जाया गया, लेकिन वहां उसे भर्ती करने से मना किया गया। आखिरकार इसी वजह से उसकी जान चली गई। सवाल है कि जघन्य अपराध का शिकार हुई पीड़ित बच्ची को तुरंत उपचार मुहैया कराना डाक्टरों ने जरूरी क्यों नहीं समझा? ऐसे में बच्ची की मौत के लिए आखिर उन अस्पतालों और वहां मौजूद डाक्टरों को भी जिम्मेदार क्यों नहीं माना जाए?

इस मामले में बीते शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों और डाक्टरों को कड़ी फटकार लगाते हुए तल्ख टिप्पणी की कि अगर आप अपनी ड्यूटी नहीं निभा सकते, तो आपको डाक्टर कहलाने का कोई हक नहीं है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या आपने इसलिए नजरअंदाज किया कि पीड़ित बच्ची गरीब थी और आपकी फीस नहीं दे सकती थी? शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी इस घटना के बहाने बड़े फलक के सवाल उठाती है।

यह शिकायत आम है कि निजी अस्पतालों में किसी मरीज के इलाज के बजाय पैसे को ज्यादा अहमियत दी जाती है और गरीब तबकों के लोगों को वहां उपेक्षा या खराब व्यवहार का सामना करना पड़ता है। मगर बलात्कार जैसे गंभीर अपराध का शिकार और घायल होने की स्थिति के बावजूद अगर बच्ची का इलाज करने से मना किया गया, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन अस्पतालों के प्रबंधक और डाक्टर कितने संवेदनहीन रहे होंगे। चिकित्सा पेशे से जुड़े सभी लोगों और संस्थानों को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के आलोक में अपनी ड्यूटी और उपयोगिता के बारे में ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ विचार करने की जरूरत है।

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भारत समेत दुनिया भर में अनशन के जरिए व्यवस्था में बदलाव लाने की कोशिशें इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। आजादी के बाद देश के संविधान में अभिव्यक्ति के अधिकार को शामिल किया गया, जिसमें शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन की अनुमति का भी प्रावधान है। संविधान देश के हर नागरिक को यह इजाजत देता है कि वह शासन-प्रशासन, संस्था या किसी समूह की नीतियों और निर्णयों को लेकर कानून के दायरे में रहकर अपना असंतोष प्रकट कर सकता है। ऐसे में सवाल है कि क्या किसी व्यक्ति को अनशन करने से जबरन रोका जा सकता है? यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…