ताज़ा खबर
 

संपादकीयः सिंगुर का संदेश

बुधवार को आए सिंगुर भूमि अधिग्रहण के मामले में सर्वोच्च अदालत के फैसले के दूरगामी नतीजे हो सकते हैं।

Author September 2, 2016 03:30 am
(Express File Photo)

बुधवार को आए सिंगुर भूमि अधिग्रहण के मामले में सर्वोच्च अदालत के फैसले के दूरगामी नतीजे हो सकते हैं। इस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने सिंगुर के विवादास्पद भूमि अधिग्रहण को निरस्त कर दिया। साथ ही, किसानों से ली गई जमीन उन्हें लौटाने का भी आदेश दिया है। यह सिंगुर के किसानों की भी जीत है और ममता बनर्जी की भी। गौरतलब है कि 2006 में बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने टाटा मोटर्स के नैनो कार उत्पादन संयंत्र के लिए 997.11 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। इस अधिग्रहण की चपेट में आने वाले बहुत-से किसान अपनी जमीन नहीं देना चाहते थे। अनिच्छुक किसानों की तरफ से ममता बनर्जी ने अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उनके आंदोलन और लंबे अनशन के चलते सिंगुर मामला राजनीतिक पटल पर छा गया।

विवाद और विरोध को देखते हुए टाटा ने अपनी नैनो परियोजना गुजरात के साणंद में स्थानांतरित कर दी। पहले भी, भूमि अधिग्रहण के खिलाफ कई आंदोलन चले थे। पर सिंगुर और नंदीग्राम के मामले किसानों के विरोध, और साथ ही, वाम मोर्चा सरकार की ज्यादती के बड़े प्रतीक बन गए। इससे तब तक मुख्यत: शहरी आधार वाली तृणमूल कांग्रेस को ग्रामीण बंगाल में पैर पसारने में खूब मदद मिली। नतीजतन 2011 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे को जबर्दस्त झटका लगा और चौंतीस साल से लगातार अभेद्य रहा उसका किला ढह गया। सरकार ममता बनर्जी की बनी। उन्होंने वादा किया था कि उन्हें सत्ता में आने का मौका मिला तो वे सिंगुर की जमीन मूल मालिकों को लौटा देंगी। सत्ता में आने पर उन्होंने इस मकसद से कानून बनाया। पर वह कदम अदालती फच्चर में फंस गया। कोलकाता हाइकोर्ट ने जनवरी 2008 में उस कानून को असंवैधानिक ठहरा दिया। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने किसानों और कुछ एनजीओ की अपील पर सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया है।

सर्वोच्च अदालत ने याचिका में दिए गए इन तथ्यों और तर्कों को माना कि अधिग्रहण की प्रक्रिया काफी दोषपूर्ण थी और किसानों के दावों तथा आपत्तियों का ठीक से निपटारा नहीं किया गया। यह भी कम विचित्र नहीं कि परियोजना स्थानांतरित करने के बावजूद टाटा मोटर्स ने जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखा। अदालत ने जमीन मूल मालिकों को लौटाने का आदेश तो दिया ही है, यह भी कहा है कि उन्हें दिया गया मुआवजा वापस नहीं लिया जा सकता, क्योंकि दस साल तक जमीन औरों के पास रही। सिंगुर और अन्य कई आंदोलनों का असर यह हुआ कि 1894 से चले आ रहे भूमि अधिग्रहण कानून की जगह नया कानून बना, जिसे सभी दलों का समर्थन मिला।

सिंगुर की जमीन काफी उपजाऊ थी। सिंगुर की देशव्यापी चर्चा का ही असर रहा होगा कि नए कानून में दो फसली और तीन फसली जमीन का अधिग्रहण भरसक न करने का प्रावधान किया गया। पर विडंबना यह है कि सर्वसम्मति से नया कानून बने साल-डेढ़ साल ही हुआ था कि उसे पलीता लगाने की कोशिश हुई। मोदी सरकार ने नए कानून की बाबत कॉरपोरेट जगत की शिकायतें दूर करने के इरादे से एक अध्यादेश जारी किया। इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई और सरकार को व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा। फलस्वरूप तीन बार अध्यादेश जारी करने के बाद सरकार को उसकी जगहविधेयक लाने का इरादा छोड़ देना पड़ा। आखिरकार कृषिभूमि के अंधाधुंध अधिग्रहण पर तो अंकुश लग गया, पर खेती को पुसाने लायक बनाने के सवाल पर अब भी खामोशी ही छाई है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App