उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी को सिर्फ पुलिसिया चूक पर टिप्पणी मान कर टाल देना एक बड़े सवाल की अनदेखी होगी। बुधवार को शीर्ष अदालत ने जिस तरह प्राथमिकी, जांच और पुलिस के हलफनामे पर सवाल उठाए, उससे राज्य की पुलिस की कार्यशैली और विश्वसनीयता को लेकर चिंताजनक सवाल उभरते हैं।

सवाल यह है कि जिस मोटरसाइकिल सवार को घटनास्थल पर पकड़ने की बात स्वीकारी गई, प्राथमिकी में उसे ‘अज्ञात’ कैसे और क्यों बताया गया। बाद के हलफनामे में उसका नाम सामने आया। अदालत ने इसी विसंगति पर स्पष्टीकरण मांगा। पुलिस के हलफनामे को पीठ ने पूरी तरह प्रभावहीन बताया।

सवाल केवल प्राथमिकी में नाम दर्ज करने तक सीमित नहीं है। किसी भी मामले में प्राथमिकी दरअसल जांच की वह पहली कड़ी होती है, जिस पर आगे की कार्रवाई टिकी होती है। मगर जब उसी में तथ्य सुविधा के मुताबिक जोड़े या घटाए जाने की कोशिश हो, तो जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।

अदालत ने मामलों को संभालने के तौर-तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में जनता पुलिस पर भरोसा कैसे करे। यहां तक कि अदालत ने सभी जांच में सीबीआइ को शामिल करने और राज्य पुलिस को खत्म करने तक की संभावना का उल्लेख किया। भले ही यह कोई आदेश नहीं, अदालत की मौखिक टिप्पणी है, फिर भी इसकी गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यह एक तरह से राज्य पुलिस की मंशा और क्षमता पर सवालिया निशान है। पुलिस के पास कानून लागू करने की असाधारण शक्ति होती है। इसलिए उससे अपने दायित्वों का निर्वाह और कार्यशैली में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की अपेक्षा भी स्वाभाविक है।

उसकी साख नागरिक के इस भरोसे से बनती है कि कानून सबके लिए एक समान है। मगर पिछले काफी समय से विभिन्न मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली में आग्रह के मुताबिक रुख अपनाने पर सवाल उठते रहे हैं।

ऐसे में बुलंदशहर की घटना के संदर्भ में शीर्ष अदालत की टिप्पणी और नाराजगी व्यापक पैमाने पर पसरी लापरवाही के बीच पुलिस की जांच-पद्धति में ईमानदारी और जवाबदेही सुनिश्चित किए जाने के तकाजे को रेखांकित करती है।