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संपादकीयः लोकपाल का इंतजार

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकपाल संबंधी कानून बन जाने के साढ़े चार साल बाद भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। इस बारे में सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही केंद्र सरकार से जवाब तलब किया।

Author July 4, 2018 04:02 am
न्यायालय ने गैर-सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को दस दिनों के भीतर हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा है कि लोकपाल की नियुक्ति कब तक होगी और इस बारे में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकपाल संबंधी कानून बन जाने के साढ़े चार साल बाद भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। इस बारे में सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। न्यायालय ने गैर-सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को दस दिनों के भीतर हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा है कि लोकपाल की नियुक्ति कब तक होगी और इस बारे में क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत की इस सख्ती को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि लोकपाल संस्था का गठन होकर रहेगा और अब इसमें विलंब नहीं हो सकता। अब तक इसमें होती आ रही देरी की असल वजह सरकार की इच्छाशक्ति की कमी ही रही है। बहाना कानून के एक प्रावधान से पैदा हुई अड़चन का बनाया जाता रहा है। यूपीए सरकार के अंतिम दिनों में आम सहमति से पारित लोकपाल कानून में प्रावधान है कि लोकपाल का चयन करने वाली समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष का नेता, देश के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय का कोई जज तथा एक प्रख्यात न्यायविद सदस्य होंगे। लेकिन हुआ यह कि यूपीए सरकार की विदाई के बाद से लोकसभा में विपक्ष का कोई मान्यता-प्राप्त नेता नहीं रहा है।

कांग्रेस विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी जरूर है, पर उसे लोकसभा में इतनी सीटें हासिल नहीं हो सकीं कि वह सदन में अपने नेता को नेता-प्रतिपक्ष का दर्जा दिला सके। नेता-प्रतिपक्ष न होने का हवाला देकर ही केंद्र सरकार लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया टालती आई है। लेकिन वह चाहती तो नेता-प्रतिपक्ष के लिए आवश्यक न्यूनतम सदस्य-संख्या की शर्त को छोड़ लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लोकपाल संबंधी चयन समिति में शामिल कर चयन की प्रक्रिया को काफी पहले ही मंजिल तक पहुंचा सकती थी। इस पर किसी को क्यों एतराज होता? लेकिन अमूमन कोई भी सरकार भ्रष्टाचार-विरोधी स्वायत्त संस्था पसंद नहीं करती। भाजपा विपक्ष में रहते हुए सीबीआइ को स्वायत्त बनाने की वकालत करती रही, मगर सत्ता में होने पर उसे यह जरूरी नहीं लगता कि सीबीआइ सरकार के नियंत्रण से आजाद हो। विपक्ष में रहते हुए भाजपा यह दोहराते नहीं थकती थी कि वह सशक्त लोकपाल चाहती है। लेकिन अब उसे लोकपाल संस्था का वजूद में आना शायद असुविधाजनक मालूम पड़ता होगा। लोकपाल कानून से पहले, सूचनाधिकार कानून बना था, सरकारी कामकाज में अधिक जवाबदेही और अधिक पारदर्शिता लाने के मकसद से। लेकिन सूचना आयोगों को लेकर भी केंद्र और भाजपा ने विचित्र रवैया अख्तियार कर रखा है।

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) और राज्यों के सूचना आयोगों (एसआइसी) में समय से नियुक्तियां न किए जाने से काफी सारे पद खाली पड़े हैं। लिहाजा लंबित अपीलों का बोझ बढ़ता जा रहा है, और यही हालत रही तो सूचना आयोग व्यवहार में पंगु होकर रह जाएंगे। क्या यह सुनियोजित रूप से हो रहा है? जो हो, इस मसले पर भी केंद्र को अदालत की फटकार सुननी पड़ी है। सीआइसी और एसआइसी में बड़ी संख्या में रिक्त पदों के मुद्दे पर सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को केंद्र से जवाब मांगा और कहा कि इससे ढेर सारी लंबित अपीलों और शिकायतों को निपटाने में दिक्कत हो रही है। यह उस सरकार का हाल है जो रोज भ्रष्टाचार से लड़ने का दम भरती है। अगर भ्रष्टाचार को सचमुच मिटाना है तो यह नारों और हवाई घोषणाओं से नहीं होगा, इसके लिए आरोपों का संज्ञान लेने वाली, जांच करने वाली तथा अभियोजन वाली संस्थाओं को सक्षम व स्वायत्त बनाना होगा।

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