गुजरात में सूरत के सरकारी मेडिकल कॉलेज में रैगिंग की वजह से एक छात्र की आत्महत्या के मामले ने फिर यही साबित किया है कि आज भी कुछ लोग अपने भीतर मौजूद श्रेष्ठता-ग्रंथि की वजह से दूसरों के मान-अपमान और यहां तक कि जीवन की भी परवाह नहीं करते। गौरतलब है कि कॉलेज में प्रथम वर्ष के एक रेजिडेंट डॉक्टर अपने चार वरिष्ठों के हाथों बेलगाम रैगिंग से इस कदर परेशान हुए कि आखिरकार उन्होंने रविवार को आत्महत्या कर ली।

मामले के तूल पकड़ने के बाद कॉलेज प्रशासन ने आरोपी रेजिडेंट डॉक्टरों को छह महीने के लिए निलंबित किया और उन्हें छात्रावास खाली करने का आदेश दिया। चारों आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के अलावा कुछ संकाय प्राध्यापकों को भी नोटिस जारी किया गया। सवाल है कि एक छात्र के पीड़ा की अति से गुजरने और आत्महत्या कर लेने के बाद कॉलेज प्रशासन की जिस तरह नींद खुली, क्या वह ऐसी सक्रियता को अपना नियमित दायित्व नहीं मान सकता था! अगर परिसर में रैगिंग पर पूरी तरह रोक लगाने को लेकर कॉलेज प्रशासन पहले से गंभीर होता, तो पीड़ित रेजिडेंट डॉक्टर की जान बच सकती थी।

विडंबना यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग के चलन के त्रासद नतीजों पर व्यापक चिंता उभरने, इस पर रोक लगाने की चौतरफा मांग और इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशानिर्देशों के बावजूद इस समस्या पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सका है। संस्थानों में आज भी ऐसी व्यवस्था कायम नहीं की जा सकी है कि वहां नवागंतुकों को बिना भय और हिचक के सहज माहौल में पढ़ाई-लिखाई करने का मौका मिले।

जिन नए विद्यार्थियों को अपने शुरुआती दौर में ही परिचय के नाम पर अपमानबोध और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, उनके मन-मस्तिष्क पर इसका गहरा असर पड़ता है और कई बार जीवन और समाज के प्रति उनका नजरिया भी निर्धारित हो जाता है।

रैगिंग की वजह से होने वाली अफसोसनाक और त्रासद घटनाओं के बावजूद न तो कुछ संस्थान इस रोग से मुक्त हो पा रहे हैं और न ही वहां के सामंती मानसिकता वाले कुछ वरिष्ठ विद्यार्थियों के भीतर ऐसी संवेदना और समझ विकसित हो पा रही है कि वे नया दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को बेहतर अनुभव दे सकें।