देश भर में विद्यार्थियों के आत्महत्या करने की बढ़ती घटनाएं एक गंभीर सामाजिक और शैक्षिक चिंता बनती जा रही है। पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य को लेकर दबाव कई विद्यार्थियों को मानसिक तनाव की ऐसी स्थिति में पहुंचा देता है, जहां उन्हें समस्याओं के समाधान का कोई रास्ता नजर नहीं आता। यह शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ संस्थानों तथा परिवार एवं समाज से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में अच्छे अंक लाने, प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने और बेहतर करिअर बनाने की होड़ में विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। इसकी पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय की ओर से गठित समिति के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के नतीजों से भी होती है। इसमें नौ फीसद विद्यार्थियों ने आत्महत्या के विचार आने की बात मानी है, जबकि करीब पंद्रह फीसद विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि पिछले छह महीनों में वे ऐसे दौर से गुजरे, जब उन्होंने खुद को बेहद परेशान या तनावग्रस्त महसूस किया।
जाहिर है कि विद्यार्थियों पर दबाव को कम करने और उनकी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए जमीनी स्तर पर ठोस उपाय करने की नितांत आवश्यकता है।
अहम सवाल यह है कि क्या शिक्षण संस्थान महज अंकों की प्रतिस्पर्धा के केंद्र बनकर रह गए हैं! क्या विद्यार्थियों की परेशानियों के समाधान को लेकर संस्थानिक संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को हाशिये पर रखा जा रहा है? राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में देश भर में तेरह हजार से अधिक विद्यार्थियों ने विभिन्न कारणों से आत्महत्या की।
हाल ही में आइआइटी मुंबई में एक छात्र की आत्महत्या की घटना ने एक बार फिर इस मसले पर व्यापक चिंता और व्यवस्था में सुधार की जरूरत को रेखांकित किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच देश के तेईस आइआइटी में विद्यार्थियों की आत्महत्या के पैंतालीस मामले सामने आए।
नए सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 34 फीसद विद्यार्थियों ने माना कि उन्होंने किसी न किसी स्तर पर परिसर में खुद को बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस किया। इससे स्पष्ट है कि शिक्षण संस्थानों में ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है, जहां शिक्षा के साथ-साथ भावनात्मक अभिव्यक्ति और शिक्षकों के साथ खुले संवाद को भी महत्त्व दिया जाए।
शिक्षण संस्थानों में परामर्श की सुविधा का सवाल भी महत्त्वपूर्ण है। सर्वेक्षण के दौरान बत्तीस फीसद शिक्षार्थियों ने कहा कि उनके संस्थान में परामर्श की सुविधा नहीं है। ऐसी स्थिति में जब स्कूलों से लेकर उच्च संस्थानों तक में पढ़ाई, परीक्षा, करिअर और भविष्य को लेकर बढ़ता दबाव विद्यार्थियों को मानसिक तनाव की ओर धकेल रहा है, तो उनके लिए परामर्श की सुविधा अत्यंत जरूरी हो जाती है।
शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि इसमें विद्यार्थी का सामाजिक, भावनात्मक, नैतिक और मानसिक विकास भी शामिल है। मगर सवाल है कि देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में क्या इन मानदंडों पर ध्यान दिया जाता है, या फिर शिक्षण संस्थान महज पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराने तक ही सीमित हैं?
विद्यार्थियों की जान और मानसिक स्वास्थ्य किसी भी परीक्षा और करिअर की उपलब्धि से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल पेशेवर तैयार करना नहीं, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों की समझ और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना भी होना चाहिए।
