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संपादकीयः दक्षता की दरकार

प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों को लोकसेवक कहा जाता है। उनकी जिम्मेदारी है कि वे आम नागरिकों से नजदीकी बनाए रख कर उनकी समस्याओं को सुनें, समझें और उनके समाधान का प्रयास करें।

भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार अपने पिछले कार्यकाल से ही सरकारी दफ्तरों के कामकाज में सुधार लाने के प्रयास करती रही है।

प्रशासनिक सुधार की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है। इसके लिए गठित समितियां और आयोग अनेक मौकों पर अपने सुझाव पेश कर चुके हैं। उनमें से कुछ को लागू भी किया गया, पर प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों से जैसी दक्षता, कर्तव्यनिष्ठा और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती रही है, वह पूरी नहीं हो पाई। अधिकारियों-कर्मचारियों में जब तक इन गुणों का अभाव बना रहेगा, सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों में न तो अपेक्षित गति आ पाएगी और न आम नागरिकों को उनके बुनियादी हक दिलाए जा सकेंगे। भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार अपने पिछले कार्यकाल से ही सरकारी दफ्तरों के कामकाज में सुधार लाने के प्रयास करती रही है। इसके लिए उसने कई कदम भी उठाए हैं, जिसमें हर कर्मचारी के समय पर दफ्तरों में पहुंचने और उनके काम करने पर निगरानी का तंत्र विकसित किया गया। उनकी जवाबदेही सुनिश्चित की गई। अब कर्मचारियों के कामकाज के नियमित मूल्यांकन पर भी विचार चल रहा है। इसी क्रम में प्रशासनिक अधिकारियों की दक्षता विकसित करने के लिए राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता विकास कार्यक्रम- मिशन कर्मयोगी- की शुरुआत की गई है। इसके तहत लोकसेवा के चयनित अधिकारियों को उनके कामकाज में दक्ष बनाने का प्रयास किया जाएगा। सरकार ने इसके लिए विभिन्न विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों के सहयोग से प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की है। अब तक अधिकारियों का प्रशिक्षण और मूल्यांकन नियम आधारित था, अब उनके काम पर आधारित होगा।

प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों को लोकसेवक कहा जाता है। उनकी जिम्मेदारी है कि वे आम नागरिकों से नजदीकी बनाए रख कर उनकी समस्याओं को सुनें, समझें और उनके समाधान का प्रयास करें। पर हकीकत यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों और आम नागरिकों के बीच फासला इतना बढ़ता गया है कि कोई साधारण आदमी उनके सामने खड़े होकर डर से अपनी बात तक नहीं कह पाता। जबकि सरकार तक जनता के पहुंचने का सबसे सुगम साधन प्रशासनिक अधिकारी ही होते हैं। अधिकारियों के जरिए ही लोकतंत्र जमीन पर उतरता है। पर अधिकारियों की जनता से दूरी बढ़ने के कारण नीचे के कर्मचारियों की भी मनमानी बढ़ती गई है और छोटे-छोटे कामों के लिए भी रिश्वत का चलन बढ़ता गया है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी कतई नहीं कही जा सकती। इसलिए प्रशासनिक सुधार की मांग उठती रही है। अगर केंद्र सरकार की ताजा पहल से प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों को कर्मयोगी के रूप में तैयार करने में मदद मिलती है, तो यह बहुत बड़ा प्रशासनिक सुधार होगा।

हालांकि पहले भी सेवा काल में अधिकारियों-कर्मचारियों को बदलती स्थितियों के मुताबिक प्रशिक्षण और कौशल विकास संबंधी अध्ययनों की सुविधाएं उपलब्ध थीं। जो अधिकारी चाहते थे और सरकार उन्हें उपयुक्त मानती थी, वे विशेष अध्ययन के लिए विदेश भी जाते थे। मगर प्रशासनिक कामकाज का ढर्रा नहीं बदल पाया है, तो इसलिए कि अधिकारियों का मानस अब भी औपनिवेशक ढांचे में बंधा हुआ है। अधिकारियों और जनता के बीच बनी हुई दूरी तभी मिट पाएगी, जब यह मानसिकता बदलेगी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब कहीं किसी अधिकारी ने आम लोगों से नजदीकी बना कर काम किया, तो उसके उल्लेखनीय नतीजे आए हैं। इसके अलावा प्रशासनिक अधिकारियों को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखना जरूरी है, तभी उनमें कर्तव्यनिष्ठा का विकास संभव है। प्रशासनिक सुधार के लिए गठित समितियां इसे बार-बार रेखांकित कर चुकी हैं। इसलिए अधिकारियों-कर्मचारियों में कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण के साथ-साथ उनकी मानसिकता बदलने और राजनीतिक दबाव से उन्हें मुक्त रखने की जरूरत पर भी विचार करना होगा।

 

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