भ्रष्टाचार के गढ़

नोएडा के सुपरटेक मामले में भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाए गए विशेष जांच दल (एसआइटी) ने काम शुरू कर दिया है।

सांकेतिक फोटो।

नोएडा के सुपरटेक मामले में भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाए गए विशेष जांच दल (एसआइटी) ने काम शुरू कर दिया है। यह जांच दल अब नोएडा विकास प्राधिकरण के उन अधिकारियों से पूछताछ करेगा जो सुपरटेक मामले से जुड़े रहे थे। साथ ही सालों पुरानी संबंधित फाइलें भी खंगाली जाएंगी, ताकि पता चल सके कि किस-किस स्तर पर प्राधिकरण के अधिकारी भवन निमार्ता पर मेहरबान रहे और उन्हें बेजा फायदा पहुंचाते रहे। इस कवायद का कोई फायदा तभी होगा जब जांच दल तत्परता और निष्पक्षता के साथ मामले की तह तक जाएगा और तथ्यों का पता लगा कर दोषियों को कठघरे में लाने के प्रयास करेगा। और तभी भविष्य में भवन निमार्ताओं की मनमानी पर लगाम लग सकेगी।

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते सर्वोच्च अदालत ने नोएडा में बनी सुपरटेक की चालीस-चालीस मंजिला दो इमारतों को गिराने का निर्देश दिया था। ये दोनों इमारतें जिस तरह से खड़ी कर दी गई थीं, वह अपनी तरह का कम गंभीर मामला नहीं है। सुपरटेक का मामला बता रहा है कि जमीनों के आंवटन से लेकर भवन निर्माण तक में प्राधिकरण के अधिकारियों और भवन निमार्ताओं की सांठगांठ कितनी जबर्दस्त है। इससे यह भी पता चलता है कि अरबों रुपए के भवन निर्माण कारोबार में भवन निमार्ता किस तरह से प्राधिकरण के अधिकारियों को पैसे के बल पर अपने कब्जे में करके उनसे अपने मनमुताबिक फैसले करवाते चले जाते हैं। इससे प्राधिकरण को भारी राजस्व हानि तो होती ही है।

निसंदेह यह अदालत के फैसले से बने दबाव का ही नतीजा है कि जांच को लेकर प्रदेश सरकार को सक्रिय होना पड़ा। सर्वोच्च अदालत ने सुपरटेक की दोनों इमारतों को गिराने के साथ ही प्राधिकरण के उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के आदेश भी दिए हैं जिनके कार्यकाल में सब होता चला गया। इसलिए अब प्रदेश सरकार 2004 से 2017 के बीच नोएडा प्राधिकरण में तैनात उन अधिकारियों की सूची बनवा रही है जो सुपरटेक मामले से जुड़े रहे थे। सुपरटेक का मामला सिर्फ प्राधिकरण की ही नहीं, बल्कि राज्य सरकार की कार्य संस्कृति पर भी सवाल खड़े करता है। इससे तो लगता है कि सरकार में ऊपर से नीचे तक कोई यह देखने वाला नहीं है कि कहां क्या गलत हो रहा है। सवाल यह है कि क्या प्राधिकरणों में कहीं कोई निगरानी का तंत्र नहीं हैं? और अगर हैं तो फिर वर्षों तक इस महकमे का निगरानी तंत्र करता क्या रहा? शीर्ष अधिकारियों को क्या जरा भी भनक नहीं लग पाई कि उनके मातहत किस तरह से नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए भवन निमार्ताओं के हितों को पूरा कर रहे हैं? ऐसी इमारतें कोई एक दिन में तो खड़ी हो नहीं जातीं। जाहिर है, प्राधिकरण के अधिकारी मेहरबान बने रहे और भवन निमार्ता अपना काम करते गए।

मामला सिर्फ सुरपरटेक तक ही सीमित नहीं है। नोएडा में कई नामी बिल्डरों ने घर खरीदने वालों के साथ जिस तरह का धोखा किया है, वह भवन निमार्ताओं और प्राधिकरण के अधिकारियों की सांठगांठ का ही नतीजा है। आज भी नोएडा में डेढ़ लाख और ग्रेटर नोएडा में दो लाख लोगों को फ्लैटों का कब्जा नहीं मिला है। पिछले डेढ़ दशक के दौरान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भवन निर्माण कारोबार तेजी से पनपा है। भवन निमार्ताओं को जमीनों के आवंटन में भारी भ्रष्टाचार की खबरें सामान्य बात हो चली हैं। ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि पिछले डेढ़ दशक में कई सरकारें आईं, लेकिन प्राधिकरणों में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का साहस किसी ने नहीं दिखाया। इसी का नतीजा है कि आज प्राधिकरण भ्रष्टाचार के गढ़ में तब्दील हो गए हैं।

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