Stampede Tragedies: देश में जब कभी भगदड़ की कोई घटना होती है, तो सरकार की ओर से आश्वासनों के जरिए यही संदेश दिया जाता है कि भविष्य में इस तरह के हादसों से बचने के लिए व्यवस्था में सुधार कर पुख्ता प्रबंध किए जाएंगे। मगर इन दावों की हकीकत तब सामने आती है, जब कुछ दिन बाद दूसरी जगह इसी तरह का हादसा हो जाता है।

इसका ताजा उदाहरण बिहार के लखीसराय जिले में अशोक धाम मंदिर के पास सोमवार सुबह देखने को मिला, जहां रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में कम से कम सात लोगों की मौत हो गई और चौदह अन्य घायल हो गए। इसी तरह उज्जैन के महाकालेश्वर परिसर में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर में भी भक्तों की भारी भीड़ के बीच भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई, जिससे कई लोगों को चोटें आर्इं।

जाहिर है कि इस तरह के हादसों से न तो सरकार और न ही मंदिर प्रबंधन या धार्मिक समागम के आयोजक कोई सबक लेते हैं। ऐसे में अहम सवाल यह है कि भगदड़ की घटनाओं पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या पीड़ित परिवारों को कुछ रुपए की आर्थिक मदद ही उनके लिए न्याय के समान है!

यह बात छिपी नहीं है कि देश भर में आए दिन भगदड़ की घटनाओं में लोगों की जान जाने का सिलसिला वर्षों से जारी है। खासकर धार्मिक स्थलों पर इस तरह के हादसे आम हो गए हैं। पिछले दो वर्षों की प्रमुख घटनाओं पर नजर डालें, तो उत्तर प्रदेश के हाथरस में जुलाई, 2024 में एक धार्मिक समागम में हुई भगदड़ में सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। पिछले वर्ष जनवरी में महाकुंभ के दौरान संगम क्षेत्र में मची भगदड़ से तीस लोगों की जान चली गई थी।

इसके बाद फरवरी में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर महाकुंभ जाने वाले यात्रियों की भीड़ के कारण इसी तरह के हादसे में अठारह लोगों की मौत हो गई थी। गत वर्ष जुलाई में हरिद्वार स्थित मनसा देवी मंदिर में हुई भगदड़ में छह श्रद्धालुओं ने दम तोड़ दिया था। सवाल है कि केंद्र और राज्य सरकारों के बार-बार आश्वासनों के बावजूद धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं हो पा रहे हैं?

किसी भी स्तर पर भीड़ प्रबंधन को लेकर गंभीरता और संवेदनशीलता नजर क्यों नहीं आती है? इस बात पर गौर करना भी जरूरी है कि एक ओर विभिन्न राज्य सरकारों की ओर से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं, ताकि इस क्षेत्र को राजस्व के एक बड़े स्रोत के रूप में विकसित किया जा सके। मगर इसके समांतर श्रद्धालुओं की सुरक्षा के मोर्चे पर कोई विशेष इंतजाम नजर नहीं आते हैं।

खबरों के मुताबिक, अशोक धाम रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की घटना उस समय हुई, जब श्रद्धालुओं की भीड़ के दबाव में अवरोधक का एक हिस्सा टूट गया और लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे। सवाल है कि स्टेशन पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए माकूल व्यवस्था क्यों नहीं की गई थी। ऐसे अवरोधक क्यों लगाए गए, जो भीड़ का दबाव झेलने में सक्षम नहीं थे?

जाहिर है कि इसके लिए स्टेशन पर तैनात कर्मियों की लापरवाही भी जिम्मेदार है। किसी भी धार्मिक स्थलों पर विशेष मौकों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब तक व्यवस्था में खामियों और वैकल्पिक प्रबंधों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक इस तरह के हादसों का सिलसिला थमने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

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इसमें कोई दोराय नहीं कि देश को आजादी मिलने के बाद बीते करीब आठ दशक का सफर जहां बहुस्तरीय विकास का जीवंत उदाहरण है, वहीं इस दौरान लोगों ने बहुत सारे उतार-चढ़ाव भी देखे। मगर इस सबके बीच एक संकल्प कायम रहा कि जिन तूफानों और मुश्किलों का सामना करके देश ने स्वतंत्रता हासिल की थी, उसकी गरिमा को कायम रखना और भविष्य को ज्यादा बेहतर बनाना सभी का दायित्व है। पढ़िए पूरा लेख…