अपराध का प्रसार

एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि उसमें बच्चों के साथ कैसा व्यवहार होता है, वे खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं।

सांकेतिक फोटो।

एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि उसमें बच्चों के साथ कैसा व्यवहार होता है, वे खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं। इस पैमाने पर हम सदा से पिछड़े नजर आते रहे हैं। कहते हैं कि समाज में शिक्षा के प्रसार से हिंसा और अपराध जैसी घटनाएं स्वत: कम होने लगती हैं। भारत में शिक्षा की दर तो बढ़ रही है, मगर हिंसा और अपराध के मामले भी उसी अनुपात में बढ़े हुए दर्ज होते हैं। सबसे चिंता की बात है कि भारत में बच्चों के साथ हिंसक व्यवहार, उनके अधिकारों के हनन पर अंकुश नहीं लग पा रहा।

नए आंकड़ों के अनुसार पिछले साल रोज करीब साढ़े तीन सौ बच्चों के साथ आपराधिक घटनाएं घटीं। हालांकि ताजा आंकड़ों में पहले की तुलना में आपराधिक मामलों में कुछ कमी दर्ज हुई है, मगर वह संतोषजनक नहीं है। कई मामलों में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं बढ़ी हैं। कोरोना काल में जब पूर्णबंदी थी और लंबे समय तक स्कूल बंद रहे, घर में रह कर ही पढ़ाई करने की मजबूरी थी, तब बाल विवाह और आॅनलाइन दुर्व्यवहार के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज हुई। हालांकि अध्ययनकर्ताओं और राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो ने इसके पीछे बड़ी वजह कोरोना काल में हुई बंदी और कामकाज के ठप पड़ जाने, परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाने को माना है।

मगर पूर्णबंदी के दौरान जब कल-कारखाने बंद रहे और उसके बाद भी बहुत सारे रोजगार सुचारु रूप से बहुत दिनों तक नहीं चल पाए, तब बच्चों के साथ काम की जगहों पर दुर्व्यवहार की घटनाएं भी नहीं होने पार्इं, इसलिए आंकड़े पहले की तुलना में कुछ घटे हुए दर्ज हुए। बंदी की वजह से बच्चों को घरों में बंद रहने पर मजबूर होना पड़ा था, ऐसे में उनके माता-पिता का अनुशासन और हिंसक व्यवहार कुछ अधिक देखा गया।

यह खुलासा बंदी के दौरान हुए अन्य अध्ययनों से हो चुका है। ऐसे में बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और सरकारी महकमों के लिए यह चुनौती बनी हुई है कि इस पर कैसे काबू पाया जाए। यों बाल अपराध, बाल अधिकारों के हनन, बेवजह प्रताड़ना, बाल मजदूरी आदि के खिलाफ कड़े कानून हैं, मगर उनका कितना पालन हो पा रहा है, इसका अंदाजा ताजा अंकड़ों से लगाया जा सकता है। बच्चों के खिलाफ आपराधिक घटनाओं के मामले में मध्यप्रदेश अव्वल है, फिर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार हैं।

भारतीय समाज में बच्चों के प्रति हिंसक व्यवहार एक आम चलन की तरह देखा जाता है। बहुत सारे लोगों की धारणा है कि मारने-पीटने से बच्चे अनुशासित होते हैं, जबकि अनेक मौकों पर, अनेक अध्ययनों से उजागर है कि मार-पीट का बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे ही बहुत सारे गरीब परिवारों के बच्चे कानूनी प्रतिबंध के बावजूद कालीन, पटाखे बनाने वाले कारखानों, चाय की दुकानों, ढाबों और घरेलू नौकर के रूप में काम करते पाए जाते हैं। वहां उनके मालिक न तो उनकी बुनियादी और अनिवार्य सुविधाओं का ध्यान रखते हैं और न खाने-पीने का। ऊपर से उनके साथ मार-पिटाई भी करते हैं। बच्चों के यौन शोषण पर काबू पाना तो दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है। इसलिए हर बार की तरह महज आंकड़ों पर चिंता जाहिर करने के बजाय ऐसे अपराधों की जड़ों पर प्रहार करने के उपायों पर विचार करने की जरूरत है।

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