न्याय की गति

संसाधनों की कमी की वजह से अगर न्यायाधिकरणों का कामकाज बाधित होता है, तो इसे केवल लापरवाही का मामला नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति का भी सबूत है।

सांकेतिक फोटो।

संसाधनों की कमी की वजह से अगर न्यायाधिकरणों का कामकाज बाधित होता है, तो इसे केवल लापरवाही का मामला नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति का भी सबूत है। न्याय-प्रक्रिया की जटिलता को आसान बनाने और उस पर बोझ को कम करने के लिए अर्ध-न्यायिक संस्थाओं के रूप में न्यायाधिकरणों का ढांचा खड़ा किया गया था। कई स्तरों पर इसके सकारात्मक नतीजे भी देखे गए। लेकिन आज हालत यह है कि इन न्यायाधिकरणों में बड़ी तादाद में खाली पड़े पदों पर नियुक्ति नहीं किए जाने की वजह से इनके कामकाज में बाधा आ रही है। ये न्यायाधिकरण पीठासीन अधिकारियों, न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अलग-अलग न्यायाधिकरणों के जिम्मे जो काम होगा, वह किस पैमाने पर बाधित हो रहा होगा। जबकि इस तरह का तंत्र गठित किए जाने के बाद सरकार को अपनी ओर से सक्रिय और संवेदनशील होकर इसके बेहतर नतीजों का दायरा निर्मित करना चाहिए था, ताकि जनता और संबंधित पक्षों का इस पर भरोसा कायम रह सके। मगर इसके प्रति सरकारी उदासीनता ने एक गंभीर स्थिति पैदा कर दी है।

यह स्थिति न समूचे तंत्र के लिए अच्छी है, न इससे सरकार की छवि बेहतर होती है। लेकिन सरकार को यह खयाल रखना चाहिए था कि इस संदर्भ में कम से कम वह अदालत के रुख पर गंभीरता दिखाती। यह बेवजह नहीं है कि इस मसले पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने अपना सख्त रवैया दिखाते हुए साफ लहजे में कहा कि केंद्र सरकार न्यायाधिकरणों में नियुक्ति नहीं करके इन अर्ध-न्यायिक संस्थाओं को ‘शक्तिहीन’ कर रही है। अदालत ने कहा कि वह केंद्र सरकार के साथ किसी तरह का टकराव नहीं चाहती, मगर चाहती है कि बड़ी संख्या में रिक्तियों की वजह से समस्याओं का सामना कर रहे न्यायाधिकरणों में केंद्र कुछ नियुक्तियां करे। दरअसल, किसी भी सरकार के लिए शीर्ष अदालत की तरह की इस तरह की टिप्पणी असहज कर देने वाली होनी चाहिए, मगर अफसोस की बात यह है कि लंबे समय से ऐसी स्थिति बने रहने के बावजूद इस ओर कोई ठोस पहल करना संबंधित महकमों को जरूरी नहीं लग रहा। सवाल है कि क्या सरकार संसाधनों की कमी और जरूरी नियुक्तियों के अभाव का न्यायाधिकरणों के कामकाज पर पड़ने वाले असर से अनजान है?

गौरतलब है कि अर्ध-न्यायिक संस्था के रूप में काम करने वाले न्यायाधिकरण सेवा मामले, टैक्स, पर्यावरण पर प्रशासनिक फैसलों या वाणिज्यिक कानून आदि से जुड़े मामलों का निपटारा करते हैं। मौजूदा समय में उन्नीस न्यायाधिकरण काम कर रहे हैं, जिनका प्राथमिक मकसद विशेषज्ञों की भागीदारी और तत्परता से फैसले करके न्याय दिलाने की प्रक्रिया को आसान और सुव्यवस्थित करना है। मगर हालत यह है कि पिछले करीब चार साल से किसी भी न्यायाधिकरण में नई न्यायिक नियुक्ति नहीं हो पाई है। राष्ट्रीय कंपनी लॉ न्यायाधिकरण, ऋण वसूली न्यायाधिकरण, दूरसंचार विवाद समाधान एवं अपील अधिकरण जैसे कई अपीलीय न्यायाधिकरणों में लगभग ढाई सौ पद खाली पड़े हुए हैं। शीर्ष अदालत की ओर से न्यायाधिकरणों के कामकाज के सुचारु संचालन के लिए बार-बार दिशानिर्देश जारी किया जा चुका है, लेकिन सरकार को उन पर अमल करना जरूरी नहीं लगता। अदालत जब भी इस मसले पर सरकार से सवाल करती है, यह जवाब देकर अपना दायित्व पूरा मान लिया जाता है कि नियुक्ति का काम प्रक्रिया में हैं। पिछले महीने अदालत ने सरकार को न्यायाधिकरणों में नियुक्ति के लिए दस दिन का समय दिया था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि अब भी अदालत में सरकार कोई उचित जवाब दे सकने की दशा में नहीं है।

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