किसी भी लोकतंत्र में जनता की ओर से अगर सरकार के रुख या उसकी नीतियों पर सवाल उठाया जाता है, तो एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक स्थिति है। ऐसे में सरकार का दायित्व होता है कि वह उन सवालों पर विचार करे, हर संभव और संतुष्ट करने वाला उचित उत्तर दे। विडंबना यह है कि कई बार सरकार की ओर से जन-आंदोलनों को लेकर उदासीनता या फिर उपेक्षा का भाव दिखाया जाता है और इसी वजह से कोई समस्या सुलझने के बजाय और ज्यादा जटिल हो जाती है।

नीट परीक्षा में गड़बड़ी के विरोध में जब युवाओं ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू किया, तभी सरकार को उनके साथ बातचीत करके कोई समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए थी। मगर सरकार की अनदेखी के बाद भी जिस तरह लोगों ने इस मसले पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को उठाना जारी रखा है, उससे साफ है कि वे फिलहाल इसे एक प्रतीकात्मक हल की तरह देख रहे हैं। हैरानी की बात है कि सरकार को आंदोलनकारियों के साथ संवाद स्थापित करके कोई रास्ता निकालना जरूरी नहीं लग रहा।

हालांकि सरकारी उदासीनता के बावजूद प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षा रद्द होने के मुद्दे पर शुरू हुआ आंदोलन अभी जारी है और अब कई नेता भी वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। मगर इस बीच पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन के साथ जुड़ने और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने के बाद जंतर मंतर पर युवाओं के आंदोलन को नई गति मिली है और वे अपनी मुख्य मांग पूरी करने पर जोर दे रहे हैं।

मगर यह चिंता की बात है कि करीब तीन हफ्ते से लगातार अनशन पर रहने की वजह से जहां सोनम वांगचुक की सेहत में लगातार गिरावट आ रही है, वहीं सरकार को उनसे बातचीत करना और अनशन खत्म कराना जरूरी नहीं लग रहा है। सवाल है कि सरकार के ऐसे रुख को लोकतंत्र के आईने में किस नजरिए से देखा जाएगा। क्या यह सरकार के लिए एक शर्मिंदा करने वाली स्थिति नहीं होनी चाहिए कि दिल्ली उच्च न्यायालय को यह याद दिलाना पड़ रहा है कि अनशन पर बैठे एक आंदोलनकारी को लेकर सरकार का क्या दायित्व होना चाहिए?

गौरतलब है कि गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर हर रोज नजर रखें और जरूरत पड़ने पर उन्हें चिकित्सीय मदद मुहैया कराएं। अदालत ने एक अहम टिप्पणी की कि जिंदगी अनमोल है और उसे बचाने के लिए अधिकारियों को सारे चिकित्सीय प्रयास करने चाहिए। साथ ही वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति की नियमित रूप से जांच करनी चाहिए। दिल्ली हाई कोर्ट के ये निर्देश निश्चित रूप से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक के जीवन को बचाने के लिहाज से अहम हैं, लेकिन यह सरकार का भी दायित्व है कि वह बिना देर किए इस मसले पर वांगचुक सहित आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित करे और कोई ठोस हल निकाले।

विचित्र यह है कि विद्यार्थियों के भविष्य को बेहतर बनाने के मुद्दे पर भूख हड़ताल करने वाले वांगचुक की बिगड़ती सेहत से फिक्रमंद विपक्षी दलों के नेता अपना समर्थन देने उनके पास पहुंच रहे हैं, जबकि सरकार की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह अपनी ओर से अनशन खत्म कराने के लिए ठोस पहल करे। इसे लोकतंत्र और जन सरोकारों के प्रति ईमानदारी दर्शाने के लिहाज से सरकार की इच्छाशक्ति की कसौटी के तौर पर भी देखा जाएगा।