भारत समेत दुनिया भर में अनशन के जरिए व्यवस्था में बदलाव लाने की कोशिशें इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। आजादी के बाद देश के संविधान में अभिव्यक्ति के अधिकार को शामिल किया गया, जिसमें शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन की अनुमति का भी प्रावधान है। संविधान देश के हर नागरिक को यह इजाजत देता है कि वह शासन-प्रशासन, संस्था या किसी समूह की नीतियों और निर्णयों को लेकर कानून के दायरे में रहकर अपना असंतोष प्रकट कर सकता है। ऐसे में सवाल है कि क्या किसी व्यक्ति को अनशन करने से जबरन रोका जा सकता है?

मामला तब और भी संवेदनशील, गंभीर और महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जब अनशन देश की व्यवस्था में सुधार के मुद्दे पर केंद्रित हो। दिल्ली में जंतर-मंतर पर पिछले बीस दिन से अनशन कर रहे जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा शनिवार को जबरन अस्पताल में भर्ती करा देने की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल, नीट में गड़बड़ियों को लेकर काकरोच जनता पार्टी (काजपा) की ओर से जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग कर रहे हैं। सोनम वांगचुक ने इस मांग के समर्थन में अनशन शुरू किया था। उम्मीद की जा रही थी कि सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर समाधान का कोई रास्ता निकालेगी, लेकिन इसके विपरीत पुलिस ने वांगचुक को जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार को असल में वांगचुक के स्वास्थ्य की फिक्र है या फिर यह सब आंदोलन की आवाज को दबाने के प्रयास का हिस्सा है?

देश में ऐसी कई घटनाओं के उदाहरण हैं, जब सरकार या उसके प्रतिनिधियों ने आंदोलनकारियों से बातचीत कर उन्हें भरोसे में लेकर अनशन समाप्त कराया है। फिर क्या वजह है कि इस मामले में सरकार को प्रदर्शनकारियों से संवाद की अब तक कोई जरूरत ही महसूस नहीं हुई और अनशन को बलपूर्वक समाप्त कराने की कोशिश को ही प्राथमिकता दी गई।

यह सच है कि सोनम वांगचुक के लगातार अनशन से उनकी सेहत बिगड़ रही थी, लेकिन जिस उद्देश्य के लिए उन्होंने यह कदम उठाया, क्या सरकार के लिए उसका कोई महत्त्व नहीं है? नीट की परीक्षाओं में पर्चालीक और अन्य तरह की गड़बड़ियां अब किसी से छिपी नहीं हैं और सरकार ने भी इसे स्वीकार किया है। ऐसे में अगर युवा वर्ग शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहा है, तो यह सरकार के लिए अप्रासंगिक या महत्त्वहीन विषय कैसे हो सकता है?

अनशन के मसले पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने निर्देश में कहा था कि जीवन अनमोल है और वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी होनी चाहिए। पुलिस अब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने के लिए इसी निर्देश का हवाला दे रही है।

मगर इस आलोक में सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के एक फैसले पर गौर करना भी जरूरी है, जिसमें कहा गया था कि भूख हड़ताल पर बैठे किसी शख्स की जिंदगी की हिफाजत करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन साथ में यह भी सुनिश्चित करना होगा कि असहमति जताने के अधिकार में कोई बाधा न आए। जाहिर है, अगर किसी शांतिपूर्ण आंदोलन की आवाज को सुनने के बजाय उसे दबाने का प्रयास किया जाएगा, तो यह लोकतंत्र के लिए किसी आघात से कम नहीं होगा।

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