इसमें दो राय नहीं कि सोशल मीडिया के आने से सूचना का प्रवाह तेज हुआ है, सार्वजनिक अभिव्यक्ति के नए अवसर खुले हैं और रचनात्मकता के प्रदर्शन को भी नया मंच मिला है। मगर सतर्कता और सावधानी न बरती जाए, तो कई बार तकनीक की सुविधा भी असुविधा बन जाती है।

सोशल मीडिया को लेकर भी इसी तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं। खासकर बच्चों और किशोरों पर इसका नकारात्मक प्रभाव ज्यादा देखने को मिल रहा है। अभी तक माना जा रहा था कि बच्चों का सोशल मीडिया पर बेरोक-टोक ज्यादा समय बिताने से वे इसके आदी हो रहे हैं, जिसका न केवल उनकी पढ़ाई पर असर पड़ रहा है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें भी पैदा हो रही हैं।

मगर अमेरिका की एक अदालत की ओर से हाल में दिए गए फैसले में कहा गया कि बच्चों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए संबंधित कंपनियां भी जिम्मेदार हैं। इन मंचों के डिजाइन में ऐसी खामियां हैं, जिसकी वजह से बच्चों को इनकी लत लग जाती है।

गौरतलब है कि आज के दौर में लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है और सस्ते इंटरनेट की सुविधा ने आभासी दुनिया तक पहुंच को आसान बना दिया है। इसका सबसे ज्यादा और गहरा असर बच्चों एवं किशोरों पर पड़ रहा है। सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से उनमें चिंता, अवसाद, नींद की कमी और एकाग्रता में कमी जैसी गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं।

इसी के मद्देनजर अमेरिका में मेटा और गूगल के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया था। अभियोजन पक्ष की ओर से दलील दी गई कि सोशल मीडिया मंचों को तकनीकी तौर पर इस तरह से तैयार किया गया है कि वे बच्चों को इसके बार-बार इस्तेमाल के लिए ललचाते हैं।

अदालत ने अपने फैसले में इस तथ्य को सही पाया और दोनों कंपनियों पर भारी जुर्माना भी लगाया। तकनीकी तौर पर भले ही यह पक्ष सही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस मामले में अभिभावकों की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी कम हो जाती है। बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नजर रखना और समय सीमा तय करना जरूरी है, ताकि उन्हें इसके दुष्प्रभावों से दूर रखा जा सके।