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साभ्यतिक सरोकार

काशी विश्वनाथ मंदिर आस्था का केंद्र होने के अलावा स्थापत्य की दृष्टि से भी एक बेजोड़ नमूना है।

साभ्यतिक सरोकार

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के पुनरुद्धार और विस्तार से न सिर्फ वहां जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए काफी सुविधा हो गई है, बल्कि संकीर्ण दायरों में सिकुड़ते गए एक आस्था और सभ्यता के प्रतीक को भी गरिमा प्राप्त हुई है। इस परिसर के पहले चरण का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने बड़े आलीशान तरीके से कर दिया। हालांकि भाजपा का अयोध्या, मथुरा और काशी के तीन धर्म-स्थलों के पुनरुद्धार का वादा बहुत पुराना रहा है, मगर काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के विस्तार और पुनरुद्धार को केवल राजनीतिक दृष्टि से देखने की जरूरत नहीं है।

यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इसलिए इसी दृष्टि से इस आयोजन की व्याख्या अधिक हो रही है। मगर इस हकीकत से कोई इनकार नहीं कर सकता कि काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास जिस तरह धीरे-धीरे इतने मकानों और दुकानों ने जगह घेर ली थी, उन गलियों से गुजरना अकेले आदमी के लिए भी मुश्किल काम हुआ करता था। बेशक काशी अपनी गलियों के लिए विख्यात है और कई लोगों को उसी में उसकी सुंदरता नजर आती है, मगर सुरक्षा की दृष्टि से वहां की गलियां उचित नहीं कही जा सकती थीं। एक बार उस क्षेत्र में बम विस्फोट हुआ था, तब से सुरक्षा के लिहाज से काशी विश्वनाथ मंदिर को जाने वाली गलियों को खतरनाक माना जाने लगा था।

अच्छी बात है कि केंद्र सरकार की पहल पर काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास की दुकानों और मकानों को खरीद कर उन्हें हटा दिया गया। इस तरह उस परिसर का विस्तार हो सका। अब अगर कोई गंगा की तरफ से जाना चाहे या शहर की तरफ से, उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होगी। पहले त्योहार आदि के समय दर्शन के लिए हजारों लोगों को घंटों कतार में खड़े रहना पड़ता था। सामान्य दिनों में भी मंदिर तक पहुंचना आसान काम नहीं था। काशी विश्वनाथ मंदिर चूंकि आस्था का बड़ा केंद्र है, इसलिए सामान्य दिनों में भी वहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी ही रहती थी। सुरक्षा जांच आदि के चलते लोगों को परिसर तक पहुंचने में काफी समय लग जाता था। अब वह समस्या दूर हो गई है।

काशी विश्वनाथ मंदिर आस्था का केंद्र होने के अलावा स्थापत्य की दृष्टि से भी एक बेजोड़ नमूना है। इसलिए वहां विदेशी सैलानी भी लगातार आते रहते हैं। सरकार का यह भी कर्तव्य है कि वह अपने देश की सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित, संरक्षित करने और उनके विस्तार पर ध्यान दे। उनसे अपने और दूसरे देशों के कला-संस्कृति के मर्मज्ञों को हमारे साभ्यतिक विकास का अध्ययन करने में काफी मदद मिलती है। इसलिए दुनिया के तमाम विकसित और अपनी सभ्यता-संस्कृति के प्रति संवेदनशील देश अपनी धरोहरों के संरक्षण और उन तक पर्यटकों की पहुंच सुगम बनाने संबंधी नीतियों पर गंभीरता से ध्यान देते हैं। जबकि इस मामले में हमारी सरकारें अक्सर उदासीन नजर आती रही हैं।

इसी का नतीजा है कि बहुत सारी सांस्कृतिक धरोहरें अपने दिन गिन रही हैं। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग पर भी अक्सर आरोप लगते रहते हैं कि वह अपनी विरासत संभाल पाने में सक्षम साबित नहीं हो पाता। इसी लिहाज से काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के विस्तार को देखे जाने की जरूरत है। हालांकि सरकार से यह अपेक्षा बेमानी नहीं कि जिस गंभीरता के साथ उसने अयोध्या, काशी और मथुरा पर ध्यान केंद्रित किया, उसी तरह दूसरी धरोहरों और साभ्यतिक केंद्रों पर भी करे।

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