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उलटा दांव

ईरानी ने तेलंगाना पुलिस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि रोहित को बचाने की कोशिश नहीं की गई। उनकी इस बात का खंडन रोहित की मां ने भी किया है और मित्रों ने भी।

Author नई दिल्ली | February 29, 2016 12:23 AM
राज्यसभा में स्मृति ईरानी और मायावती में रोहित वेमुला आत्महत्या के मुद्दे पर तकरार।

यह तय था कि संसद का बजट सत्र शुरू होते ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और रोहित वेमुला प्रकरण सदन में छाए रहेंगे। वही हुआ। विपक्ष ने सरकार की घेराबंदी की पूरी कोशिश की। सरकार की ओर से मोर्चा संभाला मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने बहुत मजबूती से सरकार का पक्ष रखा। पर लगता है उन्होंने आक्रामकता को ही सबसे कारगर बचाव मान लिया। उनका यह दांव उलटा पड़ा। उन्होंने रोहित वेमुला मामले में राज्यसभा में हुई बहस का जवाब देते हुए कहा कि उस बच्चे की लाश पर सियासत हो रही है। इस तरह की तीखी टिप्पणी पहली बार राजनीति में नहीं हुई है। पर स्मृति ईरानी के बयान ने भाजपा को सांसत में डाल दिया तो इसलिए कि उनके बोले गए कई तथ्यों पर सवाल खड़े हो गए।

ईरानी ने तेलंगाना पुलिस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि रोहित को बचाने की कोशिश नहीं की गई। उनकी इस बात का खंडन रोहित की मां ने भी किया है और मित्रों ने भी। डॉक्टरों ने भी ईरानी के बयान पर विरोध जताया है। इसके अलावा रोहित मामले को लेकर स्मृति ईरानी और मायावती के बीच तीखी तकरार हुई। ईरानी ने कहा था कि अगर बसपा उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हुई तो वे अपना सिर काट कर दे देंगी। एक रोज बाद मायावती ने कहा कि बसपा उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं है। अब स्मृति ईरानी क्या करें! लिहाजा, उन्होंने फिर ललकार का सहारा लिया, हिम्मत है तो ले जाओ! ऐसा बहुत बार होता है कि विपक्ष सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं होता। ऐसे में सिर काट कर देने का गर्जन-तर्जन क्यों? सदन विधायी कार्यों, जीवंत बहसों और जन सरोकारों के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है। विपक्ष के सवालों का जवाब तथ्यों और तर्कों के आधार पर दिया जाना चाहिए, न कि कोरी भावनात्मक टिप्पणी या ललकार भरी भंगिमा से। पर हमारी राजनीति में भावनात्मक मामलों को तूल देने का रुझान दिनोंदिन बढ़ रहा है।

जेएनयू प्रकरण में लग रहा था कि सरकार की चिंता कथित राष्ट्र-विरोधी नारेबाजी और अफजल गुरु को महिमामंडित करने वाले आयोजन को लेकर थी। पर उसने पूरे जेएनयू को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। राष्ट्र-विरोधी होने के आरोपों से संतोष नहीं हुआ तो 2013 में जेएनयू परिसर में कुछ छात्रों की तरफ से हुए महिषासुर को शहीद बताने वाले आयोजन को आरोपों की सूची में जोड़ दिया। अगर उस आयोजन से सरकार को इतनी ही परेशानी थी तो वह अब तक चुप क्यों थी? यह दिलचस्प है कि उस आयोजन में उदित राज ने भी हिस्सेदारी की थी, जो आज भाजपा के सांसद हैं। स्मृति ईरानी ने जेएनयू पर हमला बोलते हुए देवी दुर्गा के बारे में वे आपत्तिजनक वाक्य भी हूबहू सुना दिए, जो उस आयोजन से संबंधित किसी पोस्टर या परचे का हिस्सा रहे होंगे। क्या ऐसा करना जरूरी था? क्या राष्ट्र-विरोधी आरोप को हिंदुत्व का पुट देने के लिए ऐसा किया गया?

पर विपक्ष ने इसे जिस तरह ईशनिंदा का मामला बनाने की कोशिश की, वह भी गंभीर राजनीति का लक्षण नहीं कही जा सकती। इसमें भाजपा पर उसी के अंदाज में, यानी धार्मिक भावना के हथियार से, पलटवार करने की चतुराई जरूर थी, पर अंतत: इस तरह की बहस कौन ज्यादा देशभक्त की तरह कौन ज्यादा धार्मिक भावनाओं का लिहाज करने वाला की होड़ बन कर रह जाती है। मंत्री के बयान में दिए गए तथ्यों का गलत साबित होना ज्यादा गंभीर मसला है, जो कि सरकार की ही नहीं, संसद की गरिमा से भी जुड़ा प्रश्न है।

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