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संपादकीय: उम्मीद की किरण

भारत का वाहन उद्योग पिछले दो साल से संकटों का सामना कर रहा है। ऐसे में वाहन बाजार विशेषज्ञों की इस चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कोरोना संकट ने इस उद्योग को तीन से चार साल पीछे धकेल दिया है, यानी हालात सामान्य होने में तीन से चार साल लगेंगे। ऐसे में एक ही उपाय वाहन उद्योग को फिर से रफ्तार दे सकता है और वह यह कि गाड़ियों की बिक्री बढ़े।

Lockdown, corona virus, pandemicलॉकडाउन के दौरान भारी ठहराव के बाद ऑटो इंडस्ट्री में फिर सुधार की उम्मीद दिखी है।

गहराती आर्थिक मंदी और कोरोना संकट के बीच वाहन उद्योग का फिर से पटरी पर लौटना राहत भरा संकेत है। पिछले तीन-चार महीनों से वाहनों की मांग में कमी से कारखानों में उत्पादन पर भारी असर पड़ा और ऐसी भी नौबत आई कि पूर्णबंदी के दौरान कई कारखानों में तो उत्पादन बंद भी कर दिया गया था। इससे लग रहा था कि वाहनों की ब्रिकी पर लंबे समय तक ठहराव आ सकता है। अब भले कंपनियों का मुनाफा उम्मीदों के मुताबिक नहीं बढ़ रहा हो, लेकिन गाड़ियां बिकने का सिलसिला चल निकला है। यही सबसे बड़ी राहत की बात है।

अप्रैल से जून की तिमाही में खेती संबंधी कामकाज के लिए ट्रैक्टर जैसे वाहनों की बिक्री संतोषजनक रही, लेकिन कारों की ब्रिकी को लेकर लग रहा था कि लोग एकदम से गाड़ी खरीदने का फैसला नहीं करने वाले। खरीदारों के इस रुख को देखते हुए कार कंपनियों ने अपनी रणनीति बदली और कई तरह के लुभावने विकल्प पेश किए। अब लोग इसका फायदा उठा रहे हैं और वाहन खरीद रहे हैं।

सबसे ज्यादा उत्साहजनक खबर कारों की बिक्री को लेकर आई है। ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है जो पहली बार खरीद कर रहे हैं। इसके अलावा जिन लोगों के पास पहले से वाहन हैं, वे भी खरीद रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पूर्णबंदी के दौरान सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर काफी असर पड़ा है। महानगरों की जीवनरेखा माने जाने वाली मेट्रो और लोकल ट्रेन सेवाएं लंबे समय से बंद हैं। इसके अलावा, बाहर आने-जाने में जो सुरक्षा अपने वाहन में मिलेगी, वह लोकल ट्रेन, मेट्रो या सिटी बसों में मुमकिन नहीं है। इसलिए लोग अब सार्वजनिक परिवहन के बजाय निजी वाहन को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।

जिस तरह के हालात आज हैं और ज्यादातर बड़े शहर संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं, उसे देखते हुए लगता नहीं है कि स्थिति जल्दी ही सामान्य होगी। जाहिर है, जब तक कोरोना महामारी का प्रकोप खत्म नहीं हो जाता, तब तक कोई भी सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहेगा। ऐसे में हर व्यक्ति अपने वाहन से यात्रा करने में ही अपने को सुरक्षित मान कर चल रहा है। ज्यादा गाड़ियां बिकने के मूल में सुरक्षा की भावना प्रमुख पहलू के रूप में सामने आई है।

भारत का वाहन उद्योग पिछले दो साल से संकटों का सामना कर रहा है। ऐसे में वाहन बाजार विशेषज्ञों की इस चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कोरोना संकट ने इस उद्योग को तीन से चार साल पीछे धकेल दिया है, यानी हालात सामान्य होने में तीन से चार साल लगेंगे। ऐसे में एक ही उपाय वाहन उद्योग को फिर से रफ्तार दे सकता है और वह यह कि गाड़ियों की बिक्री बढ़े।

इसके लिए वाहन उद्योग को भी सरकार से रियायतों की दरकार हो सकती है और हालात सामान्य बनने तक ऐसी रियायतें अपरिहार्य भी हो जाती हैं। जो लोग नई कार खरीद पाने में समर्थ नहीं हैं, वे पुरानी गाड़ियों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं और अपने को सुरक्षित बनाने की कोशिश में हैं। इसीलिए पुरानी कारों के बाजार में भी रौनक लौटी है। पुरानी गाड़ियों के बिकने से भी नई गाड़ियों के लिए बाजार खुलता है। जो हो, वाहन उद्योग में चमक से लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा, यह भी कम बड़ी बात नहीं है।

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