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घाटी का स्वर

इसे अच्छा संकेत माना जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के सारे राजनीतिक दल केंद्र सरकार के साथ बातचीत को राजी हो गए हैं।

सांकेतिक फोटो।

इसे अच्छा संकेत माना जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के सारे राजनीतिक दल केंद्र सरकार के साथ बातचीत को राजी हो गए हैं। जब प्रधानमंत्री ने कश्मीर मसले पर सर्वदलीय बैठक के लिए घाटी की सियासी पार्टियों को न्योता भेजा तो शुरू में पीडीपी जैसे कुछ दलों की तरफ से इसमें शिरकत से इनकार की प्रतिक्रिया ही आई थी। मगर फिर जब गुपकार संगठन की बैठक हुई तो सारे दलों ने दिल्ली आने का फैसला किया। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर खत्म हुए लगभग दो साल होने को आ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया है।

इस दौरान घाटी में काफी राजनीतिक उथल-पुथल रही। लोकतांत्रिक प्रक्रिया लगभग रुकी रही। जब माहौल कुछ बेहतर हुआ और राजनीतिक गतिविधियों की छूट दी गई, तो वहां के सभी प्रमुख दलों ने मिल कर एक संगठन बनाया, जिसे नाम दिया गया गुपकार। इस संगठन की प्रमुख मांग है कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किया जाए। चूंकि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में होने वाली सर्वदलीय बैठक का एजेंडा पहले से तय नहीं है, इसलिए गुपकार के नेता अपनी पुरानी मांग को ही उस बैठक में उठाना चाहते हैं।

यह तो साफ है कि केंद्र सरकार अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को किसी भी सूरत में बहाल नहीं करेगी। राज्य का दर्जा वापस देने के मुद्दे पर बातचीत जरूर हो सकती है। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर खत्म करते वक्त खुद केंद्र सरकार ने कहा था कि जैसे ही घाटी में स्थिति सामान्य होगी, इसके राज्य का दर्जा फिर से बहाल कर दिया जाएगा। इसलिए इसे लेकर कोई अड़चन नहीं आने वाली। वहां स्थिति अब काफी बेहतर है। दहशतगर्दी पर भी काबू है। आम लोग चाहते हैं कि जल्दी कामकाज सुचारु हो और उनकी जिंदगी पुराने रास्ते पर लौटे।

इस बीच पंचायत और नगर निकाय के चुनाव भी संपन्न कराए जा चुके हैं। अब विधानसभा का चुनाव कराया जाना जरूरी है। वहां के राजनीतिक दल भी चाहते हैं कि चुनाव हों। जब तक वहां सरकार नहीं बनती, तब तक सही मायने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल नहीं हो सकती। वे यह भी समझते हैं कि सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार करना या उसमें कोई अड़ंगा अटकाना इस वक्त उचित नहीं होगा। आखिर राजनीतिक दलों का अस्तित्व राजनीतिक प्रक्रिया पर ही टिका होता है।

इस सर्वदलीय बैठक में चूंकि कोई विषय तय नहीं है, इसलिए गुपकार के नेता अपनी मांगें बेशक रखने की कोशिश करें, पर वे भी जानते हैं कि फिलहाल मुख्य मुद्दा विधानसभा चुनाव ही रहने वाला है। चुनाव से पहले वहां क्षेत्रीय परिसीमन होना है, जो वहां के राजनीतिक दलों के असहयोगपूर्ण रवैए की वजह से पिछले एक साल से टल रहा है। उसी से राज्य का दर्जा बहाल करने का रास्ता भी खुलेगा। केंद्र सरकार ने भी वरिष्ठ मंत्रियों के साथ परामर्श करके इस बैठक में सुलझाए जाने वाले मुद्दों को चिह्नित कर लिया है।

दरअसल, परिसीमन एक ऐसा विषय है, जिसके मुताबिक विधानसभा क्षेत्रों की सीमा तय होगी और उसी पर राज्य का स्वरूप निर्भर करेगा। हालांकि गुपकार नेताओं की जिद को भी समझा जा सकता है। चूंकि उन्हें घाटी के लोगों के बीच सियासत करनी है, उन्हीं के समर्थन से सत्ता तक पहुंचने का रास्ता तलाशना है, इसलिए वे वहां के लोगों की भावनाओं के खिलाफ जाने का प्रयास नहीं करेंगे। इस तरह बैठक में कुछ तल्खी भले उभरे, पर सबको मिल कर चुनाव प्रक्रिया शुरू करने पर फैसला करना ही होगा।

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