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मदद के हाथ

महामारी संकट में भारत के लिए दुनिया के कई देश आगे आए हैं। आॅक्सीजन सिलेंडर और टैंकरों से लेकर जरूरी दवाइयां, उपकरण और दूसरा सामान भारत पहुंचने लगा है।

गुजरात के अस्पताल के बाहर दयनीय हालत में कोरोना मरीज (एक्सप्रेस फोटो निर्मल हरिंद्रन)

महामारी संकट में भारत के लिए दुनिया के कई देश आगे आए हैं। आॅक्सीजन सिलेंडर और टैंकरों से लेकर जरूरी दवाइयां, उपकरण और दूसरा सामान भारत पहुंचने लगा है। जो अमेरिका चार दिन पहले तक मदद देने को तैयार नहीं था, अब वही सबसे बड़ा मददगार बना है। इससे अमेरिका के लिए भारत की अहमियत का भी पता चलता है। अमेरिका की दोस्ती की परीक्षा तब हुई जब हाल में भारत की प्रमुख टीका निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया ने कोविड टीके के निर्माण के लिए उससे कच्चा माल मुहैया कराने की अपील की। इस पर बाइडेन प्रशासन ने जिस तरह की बेरुखी दिखाई, वह हैरान करने वाली थी।

इससे जाहिर हो गया कि अमेरिका सिर्फ जुबानी सहानुभूति और छोटी-मोटी मदद के अलावा कुछ नहीं करने वाला। बाइडेन प्रशासन के इस रुख का अमेरिका के भारतीय समाज और राजनीतिकों के बीच अच्छा संदेश नहीं गया। भारत समर्थकों ने बाइडेन प्रशासन पर भारी दबाव बनाया। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भी अपने अमेरिकी समकक्ष से बात की। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री से बात की और आखिरकार मदद का रास्ता निकला। अब अमेरिका भारत को आॅक्सीजन बनाने वाली मशीनें, जीवन रक्षक प्रणाली तो देगा ही, टीका बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल भी देगा और अपने विशेषज्ञों का दल भी भारत भेजेगा।

गौरतलब है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत और अमेरिका के रिश्ते नए आयाम ले रहे हैं। अमेरिका के लिए भारत एक बड़ा बाजार है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक भागीदारी, सैन्य समझौते और हथियार खरीद समझौतों ने रिश्तों को नया अर्थ दिया है। चीन से निपटने के लिए अमेरिका ने चार देशों का जो क्वाड समूह बनाया है, भारत भी उसका सदस्य है। इतना सब होने के बाद भी अगर अमेरिका कोरोना से जूझ रहे भारत को बेचारगी में छोड़ देता तो क्या वह मित्र कहने का अधिकार रख पाता? इस मामले में दूसरे देश उससे बाजी मार जाते।

ऐसे में उसकी कम बदनामी नहीं होती। भारत जिस तरह के मुश्किल हालात का सामना करना रहा है, उससे अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश पहले गुजर चुके हैं। हालात संभालने के लिए भारत को अभी आॅक्सीजन बनाने और उसकी आपूर्ति के लिए उपकरण, टैंकरों की भारी जरूरत है। थाईलैंड, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने भारत को खाली टैंकर भेजे हैं। आयरलैंड जैसे छोटे से देश ने आॅक्सीजन कंसंट्रेटर दिए हैं। ब्रिटेन ने भी कुछ दवाइयां और उपकरण पहुंचाए हैं। आॅस्ट्रेलिया और कनाडा सहित यूरोपीय देशों ने भी मदद का भरोसा दिया है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि कई देश अभी भी महामारी से जूझ रहे हैं। संसाधन सीमित होने की वजह से दूसरों की मदद की सीमाएं हैं। कुछ देश संकट से काफी हद तक उबर चुके हैं, जबकि भारत में हालात हद से ज्यादा गंभीर होते जा रहे हैं। जाहिर है, इस वक्त भारत को हर तरह की सहायता चाहिए। भारत में केंद्र और राज्य सरकारें पहली बार ऐसे हालात से रूबरू हो रही हैं। फिर हमारा स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा भी दयनीय ही है।

ऐसे में जो देश जो भी मदद दे, वह मामूली नहीं है। मौजूदा हालात में दुनिया के सभी देश एक दूसरे की जो मदद कर रहे हैं, उसे कूटनीति से कहीं आगे जाकर देखने की जरूरत है। पिछले एक साल के कोरोनाकाल में भारत ने भी अमेरिका सहित कई देशों को मदद दी है। दवाइयों, पीपीई किट और टीकों से लेकर दूसरी चीजें पहुंचाई हैं। इस मुश्किल घड़ी में एक दूसरे की मदद न सिर्फ नैतिक दायित्व है, बल्कि यही वक्त की जरूरत है।

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