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तीसरा ध्रुव

चुनाव नजदीक आने पर राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन के लिए जगह भांपने या बनाने की कोशिश कोई नई बात नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर फिलहाल कोई चुनाव नजदीक नहीं होने के बावजूद अगर इस दिशा में कोई गतिविधि होती दिखती है तो वह लोगों का ध्यान खींचती है।

देश में मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए आठ राजनीतिक दलों के नेताओं की इस बैठक के बाद किसी गठबंधन की ओर बढ़ने के संकेत जरूर दिखते हैं। फाइल फोटो।

चुनाव नजदीक आने पर राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन के लिए जगह भांपने या बनाने की कोशिश कोई नई बात नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर फिलहाल कोई चुनाव नजदीक नहीं होने के बावजूद अगर इस दिशा में कोई गतिविधि होती दिखती है तो वह लोगों का ध्यान खींचती है। इस लिहाज से देखें तो पिछले कुछ समय से चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जाने जा रहे प्रशांत किशोर के कई दलों के नेताओं से मिलने को विपक्ष का नया मोर्चा खड़ा करने की कोशिशों के तहत देखा जा रहा है।

हालांकि देश भर में महामारी के संकट और उसके बीच सीमाओं में चलने वाली राजनीतिक गतिविधियों में यह कवायद कितना रंग ला पाएगी, यह कहना मुश्किल है, लेकिन एक पखवाड़े के भीतर प्रशांत किशोर की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता शरद पवार से तीन बार मुलाकात के संकेतों को समझने की कोशिश स्वाभाविक है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को मिली जीत के बाद इस बात की चर्चा फिर जोर पकड़ने लगी है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का विकल्प खड़ा करने की जरूरत है। लेकिन फिलहाल जिस दायरे में इस विकल्प पर चर्चा हो रही है, उसमें यह देखने की बात होगी कि इसमें शामिल पार्टियां क्या तीसरा मोर्चा खड़ा करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाती हैं!

गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों से सत्ताधारी भाजपा के नेतृत्व में राजग के सामने विकल्प के तौर पर कोई मजबूत विपक्ष नहीं दिख रहा है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो वह सीमित शक्ति के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश करती है, लेकिन सरकार के सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं खड़ा कर पाती है। इसके बावजूद राष्ट्रीय परिदृश्य में वह खुद को मुख्य विपक्ष मान कर चलती है।

ऐसी स्थिति में फिलहाल कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के तालमेल से अगर कोई मोर्चा बनता भी है तो उसमें यह निश्चित नहीं है कि कौन कितने दिन तक टिका रहेगा। यों तीसरे मोर्चे के लिए अब तक हुई ज्यादातर पहल का हासिल कमोबेश यही रहा है। इस बार भी जैसी कोशिशें दिख रही हैं और उसमें जिन पार्टियों को शामिल माना जा रहा है, उनके सामने विपक्ष के मुख्य ध्रुव को चुनना एक बड़ी समस्या रही है। मसलन, समाजवादी पार्टी अगर तीसरे मोर्चे जैसे किसी गठबंधन में शामिल होने के बारे में सोचती है तो उसके सामने कांग्रेस के साथ सहयोग करने या नहीं करने का ऊहापोह कायम रहेगा।

इसी तरह वामपंथी पार्टियों के सामने भी यह दुविधा बनी रहेगी कि भाजपा के विरोध के मोर्चे में वह कांग्रेस से कितनी दूरी बना सकेगी। पश्चिम बंगाल के हाल के विधानसभा चुनावों में भी वामपंथी पार्टियों का कांग्रेस के साथ तालमेल था। अब ताजा सुगबुगाहट में वामपंथी दलों के कुछ नेताओं के जिस तरह सक्रिय होने की खबरें हैं, उसमें कांग्रेस के साथ सहयोग का स्वरूप क्या होगा, यह अभी साफ नहीं है।

दरअसल, ताजा गतिविधियों के सुर्खियों में आने की मुख्य वजह इसमें राकांपा नेता शरद पवार का केंद्र में होना है। राष्ट्रीय राजनीति में उनका अपना एक कद है और लगभग सभी पार्टियों के बीच उनकी स्वीकार्यता भी है। शायद इसीलिए अलग-अलग दलों के नेताओं के साथ बैठक के लिए उनके आवास को चुना गया। चूंकि अभी यह तय नहीं है कि इस बैठक के बाद कोई नया मोर्चा आकार लेगा या नहीं, इसलिए राकांपा सहित दूसरी पार्टियों ने भी इस बारे में कोई स्पष्ट राय सामने नहीं रखी है। लेकिन देश में मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए आठ राजनीतिक दलों के नेताओं की इस बैठक के बाद किसी गठबंधन की ओर बढ़ने के संकेत जरूर दिखते हैं।

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