चीन की घेरेबंदी

दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान के शिखर सम्मेलन में हिंद प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा का मुद्दा छाया रहना बताता है कि सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के कई देश चीन से बढ़ते खतरे को लेकर चिंतित हैं।

सांकेतिक फोटो।

दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान के शिखर सम्मेलन में हिंद प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा का मुद्दा छाया रहना बताता है कि सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के कई देश चीन से बढ़ते खतरे को लेकर चिंतित हैं। इसीलिए शिखर सम्मेलन में भारत के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी चीन पर निशाना साधने से परहेज नहीं किया। आसियान शिखर सम्मेलन का महत्त्व इस वक्त इसलिए भी बढ़ गया है कि इसके सदस्य देशों के राष्ट्र प्रमुखों के अलावा भारत, अमेरिका, रूस, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन ने भी शिरकत की।

आसियान मंच से अमेरिका ने चीन को यह संदेश देने में भी कसर नहीं छोड़ी कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी विस्तारवादी नीतियों को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। उसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा नियमों को मानना ही होगा। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय में जहां भारत के साथ चीन का जहां जमीनी सीमा विवाद बढ़ा है, वहीं कुछ आसियान सदस्य देशों के साथ उसके समुद्री सीमा विवाद भी गहराए हैं। इसलिए इस बार आसियान शिखर सम्मेलन चीन को घेरने की भावी रणनीति के लिहाज से भी अहम रहा।

गौरतलब है कि भारत और आसियान एक-दूसरे के लिए न केवल महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि कई क्षेत्रों में परस्पर निर्भरता बनी हुई है। भारत-आसियान शिखर सम्मेलन में भारत ने आसियान की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा भी कि आसियान हमेशा से भारत की प्राथमिकता रहा है। भारत और दक्षिण पूर्व के देशों के बीच रिश्ते सदियों पुराने हैं। इसलिए चाहे सुरक्षा, क्षेत्रीय शांति के मुद्दे हों या सदस्य देशों के आर्थिक-सामाजिक विकास में भागीदार बनने का, भारत सबके साथ खड़ा है। भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार भी मामूली नहीं है। फिर कोरोना से जंग में भी भारत अपनी क्षमता के अनुरूप सभी देशों की मदद करता रहा है, आसियान देश इसे मानते भी हैं। दक्षिण पूर्व के देशों को लेकर भारत ने जो लुक ऐट ईस्ट नीति अपनाई है, उसका मकसद ही आसियान देशों के साथ मजबूत क्षेत्रीय गठजोड़ बनाना है। और पिछले उनतीस सालों में आसियान के साथ साझेदारी में यह कवायद लगातार बढ़ी ही है।

दुनिया में जब से चीन और अमेरिका का विवाद गहराया है, तब से वैश्विक समीकरण भी काफी बदले हैं। चीन की विस्तारवादी नीतियों ने अमेरिका सहित कई देशों की नींद उड़ा दी है। इससे निपटने के लिए अमेरिका तरह-तरह के वैश्विक गठजोड़ खड़े कर रहा है। अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया और जापान का चौगुट यानी क्वाड इसीलिए बना। हाल में अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया ने सैन्य समझौता कर चीन के खिलाफ नया मोर्चा खोला।

आसियान शिखर बैठक की बड़ी घटना तो यह है कि अब आस्ट्रेलिया ने आसियान के साथ रणनीतिक साझेदारी का एलान कर दिया है। इसी सम्मेलन में जापान ने चीन में मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाया। अभी आसियान के सदस्य देशों- फिलीपीन, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रुनेई आदि के साथ दक्षिण चीन सागर में समुद्री जल सीमा को लेकर चीन का विवाद चल ही रहा है। कहने को आसियान देशों के बीच भी समुद्री सीमा विवाद हैं, पर ये अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भरोसा तो करते हैं। जबकि चीन अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जैसी संस्थाओं को दरकिनार करते हुए अपने नए-नए नियम बनाता और थोपता रहा है। ऐसे में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए आसियान का भारत, अमेरिका सहित दूसरे संगठनों से अपेक्षा रखना और साझेदारी बढ़ाना स्वाभाविक ही है। ऐसी साझेदारी ही हिंद प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।

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