महामारी के दुष्प्रभाव

करीब दो साल से समूची दुनिया के साथ हमारे देश में भी महामारी के असर में कैसे हालात रहे हैं, यह छिपा नहीं है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एक्सप्रेस प्रतीकातम्क फोटो)

करीब दो साल से समूची दुनिया के साथ हमारे देश में भी महामारी के असर में कैसे हालात रहे हैं, यह छिपा नहीं है। इस बात की आशंका पहले से जताई जा रही थी कि महामारी का सामना करने के लिए पूर्णबंदी जैसे सख्त उपाय किए तो गए, लेकिन उसका असर कई बार बेहद तकलीफदेह परिस्थितियों के रूप में सामने आया। एक ओर भारी तादाद में लोगों की नौकरियां चली गईं तो दूसरी ओर बहुतों का कारोबार ठप हो गया। हालांकि दवाओं और खाने-पीने की वस्तुओं की दुकानें खुली थीं, लेकिन ज्यादातर कारोबार बंद रहे।

लेकिन इसके असर का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कई लोगों ने इससे उपजी अपनी परेशानी का हल आत्महत्या मान लिया। अब राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट में जो आकलन सामने आया है, उसमें 2019 और 2020 में खुदकुशी करने वालों के आंकड़े में कारोबारियों की संख्या यह बताती है कि महामारी का सामना करने के क्रम में कुछ अन्य पहलुओं की अनदेखी हुई। रिपोर्ट के मुताबिक बीते दो सालों के दौरान बीस हजार सात सौ अड़सठ कारोबारियों ने आत्महत्या कर ली।

अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव की वजह से पहले भी हालात बेहतर नहीं थे, लेकिन कोरोना की वजह से पैदा स्थितियों ने व्यवसाय-जगत पर बेहद प्रतिकूल असर डाला। यही वजह है कि 2019 के मुकाबले 2020 में आत्महत्या करने वाले कारोबारियों की संख्या में उनतीस फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वजहें स्पष्ट न होने के बावजूद यह माना जा सकता है कि कारोबार के पूरी तरह ठप पड़ने के चलते आर्थिक लाचारी जैसे हालात का सामना करते हुए कई लोग हिम्मत हार गए।

पूर्णबंदी के दौरान सरकार ने जिस स्तर की मदद की घोषणा की थी, वह उतनी कामयाब नहीं दिखी। उस तक समय पर बहुत सारे लोगों की पहुंच भी नहीं हो सकी। इसमें कोई संदेह नहीं कि आत्महत्या जैसे विकल्प को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इस मन:स्थिति में पहुंच गए लोगों की मदद के लिए कोई तंत्र नहीं है और न ऐसी पहलकदमी दिखती है। आर्थिक सहयोग एक पहलू है। लेकिन मुख्य पहलू हैं वे हालात, जिनका शिकार होकर कोई व्यक्ति जान देने की हद तक चला जाता है।

भारत में व्यवसाय जगत का ज्यादातर हिस्सा बहुत छोटे या मध्यम स्तर पर कारोबार के जरिए गुजर-बसर करता है। उनके पास जमा-पूंजी इतनी नहीं होती कि वे कुछ महीने या साल भर व्यवसाय बंद रख कर अपना परिवार और जीवन सहज तरीके से चला सकें। ऐसे में अभाव और कर्ज से उपजी स्थिति में सरकार या समाज की ओर से जरूरी सहायता नहीं मिल पाती, जो कई बार कुछ लोगों को मानसिक रूप से बेहद परेशान कर देती है।

अफसोस की बात यह है कि एक ओर कारोबारियों के बीच आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े चिंता पैदा करते हैं, तो दूसरी ओर रोजगार के अन्य क्षेत्रों में भी स्थिति अच्छी नहीं है। हाल ही में खुद सरकार ने संसद में यह जानकारी दी कि प्रमुख नौ क्षेत्रों में तेईस लाख से ज्यादा लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। जब संगठित क्षेत्र में यह तस्वीर है, तो असंगठित क्षेत्र में रोजी-रोटी या रोजगार के बारे में सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। सवाल है कि अगर यह प्रवृत्ति कायम रहती है तो आने वाले दिनों में इस संदर्भ में कैसे आंकड़े तैयार हो सकते हैं! अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार और विकास के नारों के बीच यह स्थिति एक विडंबना लगती है।

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