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संपादकीय: असुरक्षित आश्रय-गृह

आश्रय-गृहों में रखी गई लड़कियों के साथ अमानवीय बर्ताव से लेकर उनके कई तरह से शोषण की घटनाएं सामने आती रही हैं और उन पर राष्ट्रीय स्तर पर काफी तीखे विरोध के स्वर भी उठते रहे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थित एक आश्रय-गृह में करीब तीन दर्जन बच्चियों के यौन-शोषण और उन पर अत्याचार की जैसी घटना सामने आई थी, उसने समूचे देश के संवेदनशील लोगों को दहला दिया था।

Girls Shelter homesप्रशासनिक लापरवाही से आश्रय गृहों में बालिकाओं के शोषण की कई घटनाएं हो चुकी हैं।

कानपुर के एक सरकारी संरक्षण गृह में सत्तावन बालिकाओं के कोरोना वारयस से संक्रमित पाए जाने की घटना यह बताने के लिए काफी है कि इस बेहद गंभीर आपदा की स्थिति में भी सरकार और उसके संबंधित महकमे किस स्तर की लापरवाही बरत रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि पिछले तीन महीने से समूचे देश में पूर्णबंदी लागू है, कोई भी व्यक्ति आमतौर पर किसी से मिल-जुल नहीं सकता, इसके बावजूद आश्रय-गृह में रहने वाली इतनी बड़ी संख्या में बच्चियों के बीच संक्रमण फैल गया। जबकि सख्ती के अलावा आम दिनों में भी आश्रय-गृह के पूरी तरह सुरक्षित और निगरानी में होने का दावा किया जाता है।

गौरतलब है कि आश्रय-गृह में करीब पौने दो सौ बच्चियां रहती हैं। उनमें से एक की तबियत खराब होने पर जब जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया तो उसे कोरोना संक्रमित पाया गया। उसके बाद आश्रय-गृह में रहने वाली सभी लड़कियों की जांच की गई, उनमें से सत्तावन संक्रमित थीं। इसके अलावा, संक्रमितों में पांच और संक्रमण से बची हुई दो लड़कियों की जांच में उनके गर्भवती और एक अन्य के एचआइवी से संक्रमित होने की बात सामने आई।

जाहिर है, इसके बाद तीखे सवाल उठे कि आखिर आश्रय-गृह में बच्चियों को किन हालात में रखा जा रहा है और उनके साथ कैसा बर्ताव हो रहा है। हालांकि प्रशासन ने अपनी सफाई में यह कहा कि जिन लड़कियों को गर्भवती पाया गया, वे वहां आने से पहले से ही इस स्थिति में थीं।

हो सकता है, यही तथ्य हो। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में कोरोना से संक्रमित होने, कुछ के गर्भवती और एक के एचआइवी संक्रमित होने की गंभीरता से जांच कराने और इस लापरवाही के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत है। चूंकि मामला पहली नजर में ही बेहद चिंताजनक और घोर लापरवाही का नतीजा दिखता है, इसलिए खुद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मामले का संज्ञान लिया और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भेजा है।

आयोग ने चार हफ्ते के भीतर मामले का पूरा विवरण, अब तक की गई कार्रवाई, संक्रमितों के उपचार आदि के बारे में बताने के साथ-साथ किसी स्वतंत्र एजेंसी से समूचे मामले की जांच कराने को कहा है। सवाल है कि जब राज्य में कोरोनावायरस के संक्रमण से लड़ने के नाम पर हर स्तर पर सख्ती और अनुशासन बरतने के लिए कम से कम ऊपरी तौर पर अति-सक्रियता दिखाई देती है, तो ऐसे में आखिर इतनी बड़ी लापरवाही के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा!

विडंबना यह है कि आश्रय-गृहों में रखी गई लड़कियों के साथ अमानवीय बर्ताव से लेकर उनके कई तरह से शोषण की घटनाएं सामने आती रही हैं और उन पर राष्ट्रीय स्तर पर काफी तीखे विरोध के स्वर भी उठते रहे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थित एक आश्रय-गृह में करीब तीन दर्जन बच्चियों के यौन-शोषण और उन पर अत्याचार की जैसी घटना सामने आई थी, उसने समूचे देश के संवेदनशील लोगों को दहला दिया था।

उत्तर प्रदेश के ही देवरिया के एक आश्रय-गृह में रखी गई लड़कियों को देह-व्यापार की आग में झोंकने की खबर सुर्खियों में आ चुकी है। ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद भी भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होने देने को लेकर सरकारें क्यों अपेक्षित गंभीरता नहीं दर्शा पातीं?

क्या ऐसा इसलिए है कि इन आश्रय-गृहों में शरण लेने वाली या वहां पहुंचाई गई लड़कियां आमतौर पर गरीब पृष्ठभूमि से या फिर किन्हीं वजहों से बेहद लाचारी की हालत में होती हैं? पहले ही किसी अपराध या फिर सामाजिक त्रासदी की शिकार पीड़ित लड़कियों के लिए स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित नहीं कर पाना किसकी नाकामी है!

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