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संपादकीयः शीला के सहारे

तकरीबन तीन महीने पहले कांग्रेस के नए चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा था कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी को फिर से खड़ा होने लायक नतीजे हासिल करना है तो उसे किसी ब्राह्मण नेता को अपना चेहरा बनाना पड़ेगा।

Author July 16, 2016 03:19 am

तकरीबन तीन महीने पहले कांग्रेस के नए चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा था कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी को फिर से खड़ा होने लायक नतीजे हासिल करना है तो उसे किसी ब्राह्मण नेता को अपना चेहरा बनाना पड़ेगा। इस रूप में कुछ दिन तक प्रियंका गांधी के बारे में अटकलें लगाई जाती रहीं, पर अब राज्य के चुनावों के लिए बतौर नेतृत्व शीला दीक्षित के नाम की घोषणा के साथ यह साफ हो गया है कि प्रशांत किशोर की सलाह कोई हलकी-फुलकी राय नहीं थी। शायद उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनावों में जातिगत समीकरण को मिलने वाली तवज्जो और पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान किसी पार्टी की जीत में इसकी अहम भूमिका माने जाने के आधार पर ऐसा कहा था। यह अलग बात है कि पिछले कुछ समय से स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक भी राज्य में होने वाले चुनावों के मद््देनजर अलग-अलग जातियों के वोट के हिसाब से नेतृत्व की स्वीकार्यता का आकलन कर रहे थे। राज्य में पार्टी अध्यक्ष के रूप में राज बब्बर के बाद एक हफ्ते में कांग्रेस की ओर से घोषित तौर पर मैदान में उतारा गया यह दूसरा चेहरा है, जिसके जरिए उसने यह संदेश देने की कोशिश की है कि इस बार वह अपने ‘पुनर्जीवन’ के लिए गंभीर है।

दूसरे दलों के वोट के आधार और उनके नेताओं के बरक्स सबका ध्यान इसी पर था कि कांग्रेस और भाजपा उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए किसको अपना चेहरा बना कर मैदान में उतारती हैं। लेकिन राजनीतिक हलके में कांग्रेस की ओर से शीला दीक्षित को चेहरा बनाए जाने पर थोड़ी हैरानी जताई गई है। वे दिल्ली में तीन कार्यकाल तक मुख्यमंत्री जरूर रहीं, लेकिन यहां की सत्ता से बाहर होने में भ्रष्टाचार के मुद््दे की काफी बड़ी भूमिका रही। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अपनी नैया पार लगने की आस उन्हीं से लगाई है।
कांग्रेस ने सोचा होगा कि उत्तर प्रदेश में सक्रिय दलों में कोई नहीं है जिसका दामन पाक-साफ हो। जो शीशे के घर में रहते हैं उन्हें दूसरे पर पत्थर फेंकने से पहले अपने बारे में भी सोचना होगा।

भाजपा शीला दीक्षित को घेरने की कोशिश करेगी, तो कांग्रेस केशव प्रसाद मौर्य पर लगते आ रहे आरोपों को लेकर खामोश क्यों रहेगी! उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की कुल आबादी दस फीसद है। यही वजह है कि न केवल कांग्रेस और भाजपा, बल्कि सपा और बसपा जैसी पिछड़ों की राजनीति करने वाली पार्टियां ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने में जुटी हैं। हालांकि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पहले तक ब्राह्मण परंपरागत तौर पर कांग्रेस के साथ ही थे, लेकिन उसके बाद वे भाजपा के पाले में आ गए। इसके बावजूद पिछले कई चुनावों से यही देखा गया कि जिस दल ने उन्हें ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया, वे उसके साथ हो लिए। 2007 के विधानसभा चुनावों में बसपा ने नवासी ब्राह्मणों को टिकट दिया था और इसके सहारे मिले ब्राह्मणों के समर्थन से वह सत्ता पाने में कामयाब रही थी। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में पिछले सत्ताईस सालों से सत्ता से दूर है। भाजपा के केंद्र में आने के बाद उसकी मुश्किलें और बढ़ी हैं। अब देखना है कि फिर से शक्ति-संचय की कांग्रेस की आस शीला दीक्षित से पूरी होगी, या उसका दांव जोखिम भरा साबित होगा?

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