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भय बनाम आस्था

पिछले कुछ समय से यह सवाल उठ रहा है कि कोई व्यक्ति या समुदाय किसके प्रति आस्था रखेगा, किसी पूजा करेगा, यह उसका निजी मामला है और देश का संविधान उसे ऐसा करने का अधिकार देता है।

Author नई दिल्ली | April 13, 2016 2:01 AM
द्वारिका-शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (फाइल एएनआई फोटो)

ऐसे समय में जब हर कुछ दिन पर किसी नेता के बेमानी बयान से विवाद खड़ा हो रहा हो और कई बार उससे बेवजह सामाजिक तनाव भी पैदा हो रहे हों, समाज के अगुआ कहे जाने वालों की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे स्थिति को सहज बनाने में मदद करें। लेकिन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इसके उलट जो कहा है, वह न सिर्फ विवादास्पद, बल्कि आस्था के नाम पर जड़ और अंधविश्वासी मान्यताओं को मजबूत करने वाला है। पिछले कुछ समय से यह सवाल उठ रहा है कि कोई व्यक्ति या समुदाय किसके प्रति आस्था रखेगा, किसी पूजा करेगा, यह उसका निजी मामला है और देश का संविधान उसे ऐसा करने का अधिकार देता है। लेकिन हैरानी की बात है कि शंकराचार्य के लिए शायद एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की यह व्यवस्था कोई मायने नहीं रखती। वरना क्या वजह है कि वे महाराष्ट्र के एक बड़े इलाके में सूखे की समस्या के गहराने की प्राकृतिक वजहें समझने और सरकार से उससे निपटने के लिए उपाय करने की मांग करने के बजाय वे सार्इं बाबा की पूजा को सूखा के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं?

अगर वे सूखे की समस्या के वास्तविक कारणों से वाकिफ हैं तो उनसे यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि ऐसा कहके क्या वे अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं या फिर क्या यह आस्था के अलग-अलग प्रतीकों की आराधना करने वाले समुदायों के बीच भय के आधार पर दूरी पैदा करने की कोशिश है! इसके अलावा, उन्होंने शनि मंदिर में महिलाओं के जाने पर बलात्कार और दूसरे अपराध बढ़ने की जो बात कही है, वह और भी आपत्तिजनक है। इससे ज्यादा बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक ओर मुंबई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के मंदिर प्रवेश को उनका अधिकार मानते हुए सारी बाधाओं को दूर करने के आदेश दे रहे हैं, दूसरी ओर शंकराचार्य ऐसे बयान दे रहे हैं।

जिस दौर में महिलाओं और समाज के वंचित और कमजोर तबकों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव को किसी असभ्य समाज का लक्षण और अमानवीय मान लिया गया हो, उसमें ऐसे विचार को कैसे देखा जाएगा! खासकर धार्मिक जगत में शंकराचार्य को जो जगह प्राप्त है, क्या उन पर महिलाओं के प्रति विद्वेष भाव रखने और संविधान से मिले अधिकारों की अनदेखी करने के आरोप नहीं लगेंगे! फिर अगर किसी धर्म के दायरे में महिलाओं और दलित-वंचित तबकों को आस्था के अधिकार से इस तरह वंचित करने की कोशिशें हों तो क्या यह उस धर्म के मूल-तत्त्वों को नुकसान पहुंचाने की तरह नहीं हैं? कौन ऐसा धार्मिक मत होगा जो ऐसे भेदभाव को सही ठहरा कर मानवीय होने का दावा कर सकेगा? विचित्र है कि मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने के बजाय महिलाओं के खिलाफ बलात्कार जैसे अपराध बढ़ने का भय पैदा करके आस्था के केंद्रों की कथित पवित्रता बनाए रखने की बात की जा रही है। अगर महिलाओं के किसी धार्मिक स्थल में जाने से उसकी कथित पवित्रता भंग होती है तो खुद महिलाएं उस जगह को किस आधार पर अपनी आस्था का केंद्र मानें! इस लिहाज से देखें तो सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में सही कहा है कि महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के अधिकार पर फैसला संविधान के आधार पर होगा, न कि परंपरा के आधार पर। यही एक सभ्य और मानवीय समाज का तकाजा भी है।

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