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आस्था का आधार

शिंगणापुर शनि मंदिर के कर्ताधर्ता पुराने अंधविश्वासों के आधार पर पुरुष और स्त्री के बीच विभाजक रेखा खींचते आ रहे हैं, तो उन्हें किस आधार पर तर्कशील माना जा सकता है!

Author नई दिल्ली | Published on: January 28, 2016 12:04 AM
Shani Shingnapur, Shani Shingnapur row, Shani Shingnapur Temple, devendra fadnavis, Women activists, district adminShani Shingnapur temple में पिछले साल एक महिला के घुसने पर काफी विवाद हुआ था। यहां शनिदेव की प्रतिमा को छूना महिलाओं के लिए वर्जित है।

महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में प्रवेश की इजाजत को लेकर आंदोलन कर रही महिलाओं के दस्ते को प्रशासन ने मंदिर परिसर से सत्तर किलोमीटर दूर रोक कर शांति व्यवस्था बनाने में कामयाबी तो हासिल कर ली, पर सरकार के सामने यह चुनौती बनी हुई है कि वर्षों से चली आ रही रूढ़ि को तोड़ने के लिए वह क्या रास्ता निकाले। शिंगणापुर के शनि मंदिर चबूतरे पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। पिछले महीने एक महिला बाड़ लांघ कर वहां तक पहुंच गई, जिस पर काफी हंगामा हुआ। मंदिर प्रबंधकों ने पूरे मंदिर को पवित्र करने के लिए अनुष्ठान किया, फिर उसे दर्शनार्थियों के लिए खोला गया। तब से महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन और तमाम बुद्धिजीवी इस परंपरा को समाप्त करने की मांग करते आ रहे हैं।

हालांकि सरकार ने इस मसले को सुलझाने के लिए प्रबंधन समिति में एक महिला को भी रख दिया, मगर वहां के नियम-कायदों में कोई बदलाव नहीं हो सका। ऐसे में आंदोलन ने और तेजी पकड़ ली। उसी क्रम में महिलाओं का जत्था शनि शिंगणापुर जा रहा था। अब महाराष्ट्र सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भरोसा दिलाया है कि वे जल्दी ही महिलाओं के नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए शनि मंदिर में प्रवेश का कोई व्यावहारिक उपाय निकालेंगे। इसके लिए मंदिर प्रबंधकों से बातचीत करके समस्या का समाधान करने की कोशिश की जाएगी। हालांकि वहां महिलाओं के प्रवेश को लेकर पहली बार आंदोलन नहीं छिड़ा है। इससे पहले अंधश्रद्धा उन्मूलन समिति सहित कई संगठन सत्याग्रह कर चुके हैं। इसके कानूनी पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार किया जा चुका है कि इस तरह महिलाओं का प्रवेश वर्जित करना संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। पर सरकार अभी तक कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं तलाश पाई है तो यह उसकी कमजोरी ही कही जाएगी।

हालांकि शनि शिंगणापुर अकेली ऐसी जगह नहीं है, जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। दूसरे धर्मों में भी ऐसे पूजास्थल हैं, जहां महिलाओं को जाने की इजाजत नहीं है। उन्हें लेकर अदालतों में चुनौती दी गई है। जहां तक शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर भ्रांति है, वह केवल शिंगणापुर तक सीमित है। देश के दूसरे मंदिरों में ऐसी कोई पाबंदी नजर नहीं आती। सवाल है कि जब शनि के ही दूसरे मंदिरों में महिलाओं के जाने से पवित्रता भंग होने का खतरा नजर नहीं आता तो शिंगणापुर में ऐसी कठोरता क्यों। कई धर्मगुरु भी इस बात की वकालत कर चुके हैं कि शिंगणापुर में महिलाओं को पूजा का अधिकार बहाल होना चाहिए। पूजा व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार है। उसे किसी अंधविश्वास के आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता।

आज तमाम वैज्ञानिक प्रयोगों से स्त्री की पवित्रता-अपवित्रता जैसी धारणाओं पर से परदा उठ चुका है। फिर भी शिंगणापुर शनि मंदिर के कर्ताधर्ता पुराने अंधविश्वासों के आधार पर पुरुष और स्त्री के बीच विभाजक रेखा खींचते आ रहे हैं, तो उन्हें किस आधार पर तर्कशील माना जा सकता है! ऐसे अनेक मंदिरों में प्राचीन मान्यताओं के आधार पर स्त्री-पुरुष और अवर्ण-सवर्ण जैसी कोटियां बना कर पूजा पद्धतियों में भेद बना हुआ है। शनि शिंगणापुर मंदिर में प्रवेश के लिए आंदोलन कर रही महिलाओं की इस मांग को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि अगर वहां का प्रबंधन अपनी जिद पर अड़ा हुआ है तो वहां की व्यवस्था सरकार को अपने हाथों में ले लेनी चाहिए।

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