X

संपादकीयः जानलेवा सफाई

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिस दौर में हम बड़ी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों का ब्योरा पेश कर रहे हैं, उसी में सीवर की सफाई करने वाले मजदूरों की मौत की खबरें भी नहीं थम रही हैं।

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिस दौर में हम बड़ी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों का ब्योरा पेश कर रहे हैं, उसी में सीवर की सफाई करने वाले मजदूरों की मौत की खबरें भी नहीं थम रही हैं। पश्चिमी दिल्ली के मोतीनगर इलाके में सीवर टैंक की सफाई के लिए उतरे चार लोगों की मौत ने एक बार फिर यह साबित किया है कि नियम-कायदों को लागू कराने में प्रशासनिक नाकामी किस तरह मजदूरों की जान की दुश्मन बन रही है। रविवार को वहां पॉश कॉलोनी डीएलएफ कैपिटल ग्रीन अपार्टमेंट के सीवर की सफाई के लिए जमीन से पैंतीस फुट नीचे छह मजदूरों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के टैंक में उतार दिया गया था। वहां जहरीली गैस की चपेट में आने से चार मजदूरों की जान चली गई। सवाल है कि इन मौतों का जिम्मेदार किसे माना जाएगा! यह कैसे संभव हो पा रहा है कि दिल्ली में मजदूरों को सीवर में उतार कर सफाई कराने पर पूरी तरह रोक के कानूनी निर्देश के बावजूद यह काम धड़ल्ले से कराया जा रहा है और प्रशासन इस पर लगाम लगा पाने में सक्षम नहीं है!

गौरतलब है कि पिछले साल सीवर में ही सफाई के क्रम में कुछ दिनों के भीतर लगभग एक दर्जन मजदूरों की मौत हो जाने पर सरकार की चौतरफा आलोचना हुई थी। इसके बाद सरकार ने घोषणा की थी कि अब दिल्ली में सीवर को साफ करने के काम को सौ फीसद मशीनों से अंजाम दिया जाएगा और इस नियम का उल्लंघन करने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। अगर सीवर में उतर कर करने से किसी मजदूर की मौत होती है तो ठेकेदार के साथ-साथ स्थानीय अधिकारी और इंजीनियर के खिलाफ भी भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा। करीब साल भर पहले इस मानक प्रक्रिया को सात दिनों के भीतर लागू करने की बात कही गई थी और निजी ठेकेदारों, आवासीय सोसायटियों और मॉल आदि को भी इसके दायरे में रखा गया था। इससे संबंधित बैठक में दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री, नगर निकाय और दिल्ली जल बोर्ड सहित संबंधित महकमों के शीर्ष अधिकारी मौजूद थे। लेकिन उस निर्देश के साल भर बाद भी सीवर में मजदूरों की मौतों का सिलसिला रुका नहीं है। सवाल है कि इतने उच्च स्तर से जिस नियम को लेकर सख्त निर्देश जारी किए गए थे, उस पर अमल करने में इस कदर व्यापक लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है?

आखिर क्या वजह है कि एक ओर हमारा देश विज्ञान और तकनीक की दुनिया में विकसित देशों के समांतर होड़ में है, लेकिन जहरीली गैसों के जोखिम वाले सीवर की सफाई के लिए आधुनिक तकनीकों का सहारा नहीं लिया जाता? एक ओर लगभग सभी निर्माण कायों से लेकर नाला या सुरंग खोदने तक के जटिल कामों में भी अत्याधुनिक मशीनों और तकनीक का सहारा लिया जाता है और उनमें मजदूरों की भूमिका बहुत कम कर दी गई है, लेकिन दूसरी ओर सीवर की जहरीली गैसों के बीच बिना किसी सुरक्षात्मक उपायों के मजदूरों को उतार दिया जाता है। यह हकीकत तकनीक के क्षेत्र में प्रचारित तमाम उपलब्धियों पर सवालिया निशान लगाती हैं कि अगर उनका उपयोग समाज के हाशिये पर पड़े तबकों की जान बचाने में नहीं हो पा रहा है तो वे किस काम की हैं! लेकिन शायद यहां मसला तकनीक का नहीं, बल्कि उनके उपयोग को संचालित और नियंत्रित करने वाले महकमों और लोगों का है। क्या सीवर की सफाई के काम में लगाए गए लोगों की मौतों के प्रति इस स्तर की संवेदनहीनता इसलिए बनी हुई है कि इसके शिकार मजदूर समाज के सबसे हाशिये के तबके से आते हैं?