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आयात और निर्यात में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव आम बात है। लेकिन अभी निर्यात का जो हाल है उसे असामान्य ही कहा जाएगा। अक्तूबर में निर्यात करीब साढ़े..
Author नई दिल्ली | November 17, 2015 22:09 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (रॉयटर्स फोटो)

आयात और निर्यात में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव आम बात है। लेकिन अभी निर्यात का जो हाल है उसे असामान्य ही कहा जाएगा। अक्तूबर में निर्यात करीब साढ़े सत्रह फीसद घट गया। उदारीकरण के जमाने में निर्यात बढ़ाने पर पहले से अधिक जोर दिया जाता है। इसके लिए वित्त मंत्रालय प्रोत्साहन और रियायत भी देता रहा है। फिर भी, ग्यारह महीनों से निर्यात में गिरावट का सिलसिला बना हुआ है। बेशक यह चिंता की बात है। निर्यात घटने का नतीजा अमूमन व्यापार घाटे में बढ़ोतरी के रूप में आता है। पर मजे की बात है कि व्यापार घाटे में कमी दर्ज हुई है। इसलिए कि अक्तूबर में आयात में भी इक्कीस फीसद की कमी आ गई। व्यापार घाटा यानी आयात से निर्यात का अंतर कम होकर सात माह के निचले स्तर पर आ गया। भारत के आयात में सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का रहा है। भारत अपनी जरूरत का तीन चौथाई पेट्रोलियम आयात करता है। इसके बाद स्वर्ण आयात का नंबर है। आयात के कुल आंकड़े में आई कमी की एक बड़ी वजह सोने के आयात में आई गिरावट है; साल भर पहले के मुकाबले अक्तूबर में सोने के आयात में साठ फीसद की गिरावट आई। लेकिन आर्थिक मामलों के अनेक जानकार विदेश व्यापार की मौजूदा स्थिति को शुभ संकेत नहीं मानते। इसलिए कि व्यापार घाटा भले कम हुआ हो, पर यह निर्यात में बढ़ोतरी का परिणाम नहीं है। निर्यात के साथ-साथ आयात में भी आई कमी को वे वैश्विक बाजार में नरमी के लक्षण के रूप में देखते हैं।

प्रधानमंत्री ने भी तुर्की के अंताल्या में जी-20 के शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए वैश्विक व्यापार में दिख रहे धीमेपन पर चिंता जताई और दुनिया में पारदर्शी तथा भेदभाव-रहित व्यापार प्रणाली स्थापित करने की पुरजोर वकालत की।
जिस दिन निर्यात में गिरावट की खबर आई उसी दिन महंगाई बढ़ने की भी। दाल और प्याज की तेजी से बढ़ी कीमतें महंगाई का ग्राफ चढ़ने का मुख्य कारण हैं। पर कुल मिला कर थोक मुद्रास्फीति अब भी शून्य से 3.81 फीसद नीचे है। बीते महीने यह शून्य से साढ़े चार फीसद नीचे थी। जब आम लोग रोजाना महंगाई का दंश महसूस करते हों, थोक मुद्रास्फीति का शून्य से नीचे होना हैरान करता है।

दूसरी ओर, पिछले दिनों उपभोक्ता मूुल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई के आंकड़े आए। इसके मुताबिक खुदरा महंगाई पांच फीसद के करीब है। अगर औसत तस्वीर के बजाय मदों के हिसाब से देखें तो ख्राद्य महंगाई इससे भी कुछ अधिक है। यह तथ्य इसलिए खास मायने रखता है, क्योंकि गरीब परिवारों के खर्च का अधिकांश हिस्सा खाद्य पदार्थों से ताल्लुक रखता है। यह भी गौरतलब है कि इस स्थिति में सुधार के आसार नहीं दिखते। यों शीत ऋतु के आगमन के साथ-साथ महंगाई से राहत मिलनी चाहिए। पर इस साल मानसून के कमजोर रहने और अनेक बड़े राज्यों में सूखे के हालात ने चीनी और चावल जैसी कई मुख्य पैदावार की कीमतें चढ़ने की आशंका पैदा की है। दालों की कीमतें तो महज एक साल में डेढ़ गुनी हो गई हैं। सरकार ने तमाम सेवाओं पर जो स्वच्छता उप-कर लागू किया है वह भी महंगाई बढ़ने का एक नया सबब बन सकता है। वित्तमंत्री ने कॉरपोरेट-कर घटाने के संकेत दिए हैं। अगर राजस्व में बढ़ोतरी के दावों के बावजूद स्वच्छता मिशन के लिए सरकार के पास पैसे की कमी है, तो कॉरपोरेट जगत को करों में रियायत क्यों!

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