देश भर में शिक्षा संस्थानों, अस्पतालों, सरकारी भवनों और अन्य सार्वजनिक स्थलों को बम से निशाना बनाने की झूठी धमकियों का बढ़ता सिलसिला सुरक्षा की लिहाज से चुनौती बन गया है। ई-मेल या फिर सोशल मीडिया के जरिए इस तरह की धमकियां दी जाती हैं, जिससे न केवल लोगों में दहशत फैलती है, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों का कीमती समय और संसाधन भी बर्बाद होते हैं।

बीते सोमवार को चंडीगढ़ के कई स्कूलों और सरकारी इमारतों को बम से उड़ाने की धमकियां ई-मेल पर दी गईं, हालांकि जांच में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला। संभवत: धमकी देने वालों का मकसद महज दहशत फैलाना ही रहा होगा। मगर सवाल है कि आखिर इस तरह की घटनाओं पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? क्या सुरक्षा एजेंसियां धमकी देने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने में तकनीकी रूप से सक्षम नहीं हैं?

ये प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, क्योंकि इस तरह के ज्यादातर मामलों में पुलिस या अन्य जांच एजेंसियां अपराधियों तक पहुंच ही नहीं पाती हैं। गौरतलब है कि हाल के वर्षों में बम की झूठी धमकियां देने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।

मई, 2024 में दिल्ली-एनसीआर में एक ही दिन में करीब ढाई सौ स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी से पुलिस के हाथ-पांव फूल गए थे। हालांकि, इस तरह की तमाम धमकियां झूठी साबित हुईं, लेकिन इससे जहां दहशत का माहौल पैदा हो जाता है, वहीं जांच एजेंसियों के सामने कई चुनौतियां पैदा हो जाती हैं।

ऐसे मामलों में अब तक की जांच में सामने आया है कि धमकी भरे ज्यादातर ई-मेल वीपीएन यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क के जरिए विदेशी आईपी पते से भेजे जाते हैं। मगर आज डिजिटल तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि इसके जरिए दुनिया के किसी भी कोने में छिपे अपराधी को खोजा या पकड़ा जा सकता है।

मगर पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों में अलग से बनाई गई साइबर शाखाओं के विशेषज्ञ क्या डिजिटल तकनीक में इतने पारंगत नहीं हैं कि वे ऐसे अपराधियों का पता लगा सकें? सरकार और प्रशासन को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि यह केवल दहशत फैलाने का मामला नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा और तकनीकी क्षमता का भी सवाल है।