देशभर में स्कूली बच्चों को शारीरिक दंड देने पर कड़ी पाबंदी है। बावजूद इसके आए दिन राज्यों से ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जिनसे लगता है कि शिक्षकों को न तो अपने दायित्व का बोध है, न शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 17 (एक) की फिक्र। विद्यालयों में शिक्षक आज भी विद्यार्थियों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने से बाज नहीं आ रहे।
बीती बीस जुलाई को तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक सरकारी स्कूल में दसवीं कक्षा की छात्राओं के साथ जो बर्ताव किया गया, वह उनके लिए एक बुरे सपने की तरह था। खबरों के मुताबिक आरोपी शिक्षिका ने दस छात्राओं को बेंत से इस कदर पीटा कि उनके हाथों में गंभीर चोटें आईं और वे परीक्षा देने में भी असमर्थ हो गईं।
दरअसल, शिक्षिका ग्यारहवीं कक्षा को पढ़ा रही थीं, तभी बगल की दसवीं कक्षा में शोरगुल से वे इतनी नाराज हो गईं कि उन्होंने कक्षा में जाकर छात्राओं को बुरी तरह पीटा। इस दौरान उन्होंने शिक्षण और स्कूल परिसर के सभी नियमों को ताक पर रख दिया।
गौरतलब है कि विद्यालयों में किसी भी स्थिति में शारीरिक-मानसिक रूप से प्रताड़ित किए जाने को शिक्षा का अधिकार अधिनियम का उल्लंघन माना गया है। फिर भी यह बात वरिष्ठ शिक्षिका कैसे भूल गईं? जब वे खुद इस अधिनियम का पालन नहीं कर रहीं, तो विद्यालय का परिवेश बच्चों के लिए कैसा होगा?
पीड़ित छात्राओं में से एक छात्रा की मां की शिकायत के बाद पुलिस ने शिक्षिका के खिलाफ मामला दर्ज किया। बेंत से जख्मी हुई छात्राओं को चिकित्सा सहायता दी गई, लेकिन सवाल यह है कि छात्राओं के मन-मस्तिष्क पर लगे जख्म कैसे भरेंगे।
आमतौर पर देखा गया है कि विद्यार्थियों पर पिटाई का न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कई बार विद्यार्थी का भावी जीवन और शिक्षण भी इससे प्रभावित होता है। पिटाई को ही एकमात्र हल मान लेने वाले शिक्षकों को क्या बच्चों के मनोविज्ञान की इतनी भी समझ नहीं होती?
ऐसी स्थिति में विद्यालयों में बच्चों को सुरक्षित वातावरण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का लक्ष्य कैसे पूरा होगा? असुरक्षाबोध से ग्रस्त विद्यार्थी अगर स्कूल जाने से डरने लगें, तो निस्संदेह यह चिंता की बात होगी।
