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संपादकीयः साझे के सहारे

गुरुवार को ‘साझी विरासत बचाओ सम्मेलन’ के तहत शरद यादव ने चौदह विपक्षी दलों को एक मंच पर साथ लाकर जो पहल की है, उससे साफ हो गया कि वे अब नीतीश कुमार से विपरीत ध्रुव पर हैं।

शरद यादव

गुरुवार को ‘साझी विरासत बचाओ सम्मेलन’ के तहत शरद यादव ने चौदह विपक्षी दलों को एक मंच पर साथ लाकर जो पहल की है, उससे साफ हो गया कि वे अब नीतीश कुमार से विपरीत ध्रुव पर हैं। नीतीश ने बिहार में तो पिछले महीने ही भाजपा से हाथ मिला लिया था, अब वे केंद्र में जल्दी ही राजग का हिस्सा भी बन जाएंगे। जबकि शरद यादव विपक्षी खेमे में होंगे। इस मौके पर मौजूद कांग्रेस सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने एक नया मोर्चा बन सकने की संभावना को मजबूत किया। लगभग सभी नेताओं ने भाजपा सरकार के रवैये और उसमें आरएसएस की बढ़ती भूमिका पर तीखे सवाल उठाए और समाज में बढ़ते विभाजन को लेकर चिंता जताई। खासतौर पर राहुल गांधी ने जिस तरह तल्ख तेवर में न्यायपालिका और मीडिया से लेकर सेना तक में आरएसएस से जुड़े लोगों को नियुक्त किए जाने को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा, उससे साफ है कि विपक्ष की राजनीति में कांग्रेस अपनी मुख्य या नेतृत्वकारी भूमिका सुनिश्चित करने की कोशिश में है। लेकिन फिलहाल जो राजनीतिक हालात हैं, उसमें कोई भी शर्त भारी पड़ सकती है।

मौजूदा परिदृश्य में चौदह गैर-भाजपाई दलों को एक मंच पर ला खड़ा करना निश्चित रूप से एक अहम पहलकदमी है। कई अहम नेताओं की उपस्थिति के लिहाज से ‘साझी विरासत बचाओ सम्मेलन’ को सफल कहा जा सकता है। लेकिन इसके बाद स्वाभाविक ही नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जद (एकी) के धड़े ने शरद यादव को लेकर अपना सख्त रुख जाहिर कर दिया है और उनकी राज्यसभा की सदस्यता खारिज कराने के संकेत दिए हैं। पिछले दिनों शरद यादव के समर्थक इक्कीस नेताओं को पार्टी से निलंबित कर दिया गया था। अब पार्टी के विभाजन की सिर्फ औपचारिकता बाकी है। दरअसल, पिछले महीने बिहार में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामने और उसके साथ सरकार बनाने के बाद शरद यादव पर सबकी नजरें टिकी थीं कि वे कौन-सा रुख अख्तियार करते हैं। हालांकि कुछ दिन तक जिस तरह उन्होंने अपने बारे में कोई स्पष्ट राय जाहिर नहीं की, उससे राजनीतिक गलियारों में उनके केंद्र सरकार में मंत्री बनने की अटकलें लगाई जाने लगी थीं। लेकिन उन्होंने जो भी बयान दिए, उससे ये संकेत जरूर उभर कर आए कि वे नीतीश कुमार के फैसले से सहमत नहीं हैं।

हाल ही में बिहार में तीन दिनों के अपने जनसंपर्क अभियान के दौरान नीतीश कुमार के फैसले पर सवाल उठाते हुए उन्होंने यह कहा भी कि यह राज्य के ग्यारह करोड़ लोगों के जनादेश का अपमान है। उस यात्रा में उन्हें अपेक्षा से अधिक समर्थन मिलता दिखा और स्वाभाविक ही वे उससे खासे उत्साहित थे। अब दिल्ली में एक सफल आयोजन से शरद यादव संभवत: उत्साहित होंगे। पर असल चुनौती इसके बाद है। जमीनी और चुनावी राजनीति के लिए वे एक समय लालू पर निर्भर थे, फिर नीतीश पर। दशकों से केंद्र की राजनीति में जमे शरद यादव के लिए विपक्षी नेताओं का जमावड़ा करना कोई कठिन काम नहीं रहा होगा। लेकिन अपनी अलग पार्टी बनाना और उसे व्यावहारिक रूप में खड़ा कर पाना जरूर उनके लिए बड़ी चुनौती होगा।

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