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संस्कृत की जरूरत

दूसरे संस्कृत आयोग की सिफारिशें राजग सरकार की मंशाओं के अनुरूप ही हैं। हालांकि इनमें ज्यादातर सिफारिशें वही हैं, जो 1956 में पहले संस्कृत आयोग ने पेश की थीं।

Author October 3, 2015 5:06 PM

दूसरे संस्कृत आयोग की सिफारिशें राजग सरकार की मंशाओं के अनुरूप ही हैं। हालांकि इनमें ज्यादातर सिफारिशें वही हैं, जो 1956 में पहले संस्कृत आयोग ने पेश की थीं। तब से लेकर अब तक पढ़ाई-लिखाई का तरीका काफी कुछ बदल गया है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर जोर दिया जाने लगा है। भारतीय भाषाओं की पढ़ाई-लिखाई को भी रोजगारपरक बनाने की जरूरत रेखांकित की जा रही है। ऐसे में यह विचार का विषय हो सकता है कि दूसरे संस्कृत आयोग की सिफारिशों पर कितना ध्यान दिया जाना चाहिए। आयोग ने सुझाव दिया है कि छठवीं से लेकर दसवीं कक्षा तक अनिवार्य रूप से संस्कृत पढ़ाई जाए।

इसी तरह तकनीकी संस्थानों में भी संस्कृत पढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी प्राचीन संस्कृति और उसकी तकनीकी-वैज्ञानिक उपलब्धियों से परिचित हो सकें। संस्कृत आयोग का मानना है कि तकनीकी, प्रबंधन आदि संस्थानों में फिलहाल पढ़ाए जाने वाले विषय पश्चिमी ज्ञान और अनुभवों पर आधारित हैं, इसके चलते विद्यार्थियों में अनुशासन की कमी है। संस्कृत के जरिए भारतीय संस्कृति की शिक्षा से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास जागेगा।

आयोग ने ऐसी विशेष प्रयोगशालाएं स्थापित करने का भी सुझाव दिया है, जिनमें विद्वान और वैज्ञानिक मिल कर वैदिक वैज्ञानिक प्रथाओं, यज्ञों की वैज्ञानिकता और उपचार तथा वर्षा आदि के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों आदि का अध्ययन कर सकें। ये सिफारिशें राजग सरकार के मिजाज से अलग नहीं हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद जिस तरह विज्ञान कांग्रेस और इतिहास कांग्रेस के मंचों से मिथकीय घटनाओं को वैज्ञानिक और ऐतिहासिक तथ्यों के तौर पर पेश किया गया, उसे देखते हुए हैरानी की बात नहीं जब सरकार संस्कृत आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर गंभीरता से विचार करे।

अपनी भाषा और संस्कृति से लगाव रखना नागरिकों का नैतिक कर्तव्य होना चाहिए, पर इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि इन्हें उन पर थोपा जाए। मोदी सरकार ने शुरुआती दिनों में ही वैकल्पिक तीसरी भाषा के तौर पर स्कूलों में पढ़ाई जा रही जर्मन को हटा कर संस्कृत पढ़ाने का फैसला किया था। इसके चलते जर्मन सरकार के साथ उसका कुछ टकराव भी हुआ था। अब अगर स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य बनाया या चौथी भाषा के रूप में पेश किया जाता है तो विरोध के स्वर फिर उभरेंगे।

दरअसल, आज पढ़ाई-लिखाई का स्वरूप रोजगार को ध्यान में रख कर तय होने लगा है। इसलिए स्कूलों में वही भाषाएं पढ़ाने पर विचार किया जाता है, जिनसे विद्यार्थियों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकें। संस्कृत इस अपेक्षा पर कितनी खरी उतर पाएगी, इसका नक्शा सरकार के पास नहीं है।

नरेंद्र मोदी सरकार डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया जैसे नारों के जरिए युवा पीढ़ी को आधुनिक तकनीक से जुड़ने और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ कदम से कदम मिला कर चलने को प्रोत्साहित कर रही है, ऐसे में यज्ञ, अनुष्ठान और प्राचीन मिथकीय घटनाओं पर शोध कितने महत्त्व के साबित होंगे, कहना मुश्किल है।

विभिन्न स्कूलों, संस्थानों, विश्वविद्यालयों में संस्कृत और प्रचीन सभ्यता की पढ़ाई-लिखाई अब भी होती है, पर आधुनिक जरूरतों के मद्देनजर उनकी क्या उपयोगिता है, इन पहलुओं पर विचार करने के बाद ही संस्कृत आयोग की सिफारिशों पर अमल के बारे में सोचा जाना चाहिए।

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