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सरोकार को सम्मान

इस बार रैमन मैगसायसाय पुरस्कार के लिए संजीव चतुर्वेदी और अंशु गुप्ता का चुना जाना कई लिहाज से अहम है। संजीव चतुर्वेदी को जहां तमाम परेशानियों के बावजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाना जाता है, वहीं अंशु गुप्ता ने हाशिये के लोगों के प्रति संवेदना की एक मिसाल कायम की है।

Author July 31, 2015 8:19 AM
कई घपलों का भंडाफोड़ करने वाले अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज पर निराशा जताई है।

इस बार रैमन मैगसायसाय पुरस्कार के लिए संजीव चतुर्वेदी और अंशु गुप्ता का चुना जाना कई लिहाज से अहम है। संजीव चतुर्वेदी को जहां तमाम परेशानियों के बावजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाना जाता है, वहीं अंशु गुप्ता ने हाशिये के लोगों के प्रति संवेदना की एक मिसाल कायम की है। संजीव चतुर्वेदी ने एम्स यानी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मुख्य सतर्कता अधिकारी रहते हुए भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर किया और उस ओर सरकार का ध्यान खींचा। पर इसके बदले उन्हें पुरस्कार या तारीफ नहीं मिली, उन्हें उस पद से हटा दिया गया।

साधारण जनता की स्वास्थ्य जरूरतों के मद्देनजर जो एम्स एक उम्मीद का अस्पताल है, वहां दवाओं की खरीद, डॉक्टरों की अनधिकृत विदेश यात्राएं, चिकित्सा उपकरणों की खरीद और प्रमाण-पत्र से लेकर परिसर की विस्तार परियोजना तक में व्यापक फर्जीवाड़ा चल रहा था। ऐसे करीब दो सौ मामलों में जांच के बाद जब संजीव चतुर्वेदी ने कार्रवाई शुरू की और संस्थान के उपनिदेशक तक को फर्जीवाड़े में लिप्त होने पर कठघरे में खड़ा किया, तो न सिर्फ उन्हें सरकार से असहयोग मिला, बल्कि उनके लिए नई मुसीबतें खड़ी हो गर्इं।

जिस उपनिदेशक पर एम्स के नियमों को ताक पर रख कर नियुक्तियां करने, नौकरी में विस्तार देने, वित्तीय अनियमितता जैसे आरोप थे, उन्हें भाजपा के वरिष्ठ नेता और वर्तमान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने संरक्षण दिया और संजीव चतुर्वेदी के खिलाफ पत्र लिखे। नतीजतन, संजीव चतुर्वेदी को जिस काम के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए था, उन्हें परेशान किया जाने लगा। जाहिर है, सरकार की कार्रवाई का मकसद संदिग्धों और भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को संरक्षण देना और बचाना था।

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इस लिहाज से समूचे सत्ता-तंत्र की धौंस के बावजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होने के लिए संजीव चतुर्वेदी को मैगसायसाय पुरस्कार के लिए चुना जाना एक तरह से सरकार को उसके रवैए के लिए आईना दिखाने जैसा है। यह अफसोस की बात है कि किसी व्यक्ति को अपनी ईमानदारी और सरोकार के लिए अपने देश में तो उपेक्षा या प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है, लेकिन दुनिया भर में उसे प्रतिष्ठा मिलती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान दिया था कि ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’। लेकिन अगर इस पर अमल करने वाले अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को पिछले साल भर में प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज पर सवाल उठाने की नौबत आती है, तो समझा जा सकता है कि बयानों के बरक्स हकीकत क्या है!

इसके अलावा, मैगसायसाय पुरस्कार के लिए चुने गए मेरठ के अंशु गुप्ता एक कॉरपोरेट कंपनी में प्रबंधक की नौकरी छोड़ कर सिर्फ इसलिए अभाव से जूझते लोगों को कपड़ा मुहैया कराने के काम में लग गए कि एक गरीब बच्ची रात में ठंड से बचने के लिए कई बार लाशों से लिपट कर सो जाती थी। उस बच्ची का पिता लावारिस लाशों को उठाने का काम करता था। आज अंशु की संस्था ‘गूंज’ गरीब लोगों और आपदा पीड़ितों को हर साल दो हजार टन कपड़े मुहैया कराती है। जाहिर है, अंशु गुप्ता इस बात की मिसाल हैं कि संवेदना से तय होने वाले सरोकार जब जमीन पर उतरते हैं तो व्यक्ति के लिए निजी सुविधाओं का कोई अर्थ नहीं रह जाता। बहरहाल, संजीव चतुर्वेदी और अंशु गुप्ता को मैगसायसाय पुरस्कार के लिए चुना जाना ईमानदारी और सरोकार को सम्मानित किया जाना है।

 

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